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Krishna Pingala Sankashti Chaturthi | कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी: पूजन विधि, महत्व और लाभ | PDF

हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि को भगवान श्रीगणेश को समर्पित माना जाता है। हर माह दो बार चतुर्थी आती है — एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। जब यह चतुर्थी मंगलवार के दिन आती है तो इसे कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश के ‘कृष्ण पिंगला’ स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।

इस विशेष चतुर्थी का बहुत अधिक धार्मिक महत्व होता है क्योंकि यह भक्तों के जीवन से सभी विघ्नों, परेशानियों और संकटों को दूर करने वाली मानी जाती है। यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति, स्वास्थ्य लाभ, मानसिक शांति और सफलता के लिए किया जाता है।

कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी क्या है?

संकष्टी चतुर्थी हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आती है, जो कि चंद्रमा के घटते चरण में होती है। यदि यह मंगलवार को आती है, तो उसे ‘कृष्ण पिंगला’ नाम दिया गया है।

कृष्ण‘ का अर्थ है अंधकार या रात्रि और ‘पिंगला‘ का अर्थ है तामसी शक्ति या विशेष रूप से एक रूप जो संकटों का नाश करने वाला हो। इस दिन भगवान गणेश को उनके संकटहर्ता रूप में पूजा जाता है ताकि जीवन से सभी प्रकार के कष्ट और बाधाएं दूर हो सकें।

कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी मनाने का कारण:

  1. संकटों से मुक्ति: यह व्रत जीवन से दुख, पीड़ा, रोग, शोक, दरिद्रता आदि दूर करने के लिए किया जाता है।
  2. भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु: भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देवता माना गया है। उनके आशीर्वाद से सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं।
  3. पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति: पुराणों के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति को पूर्व जन्मों के पापों से भी छुटकारा मिलता है।
  4. संतान प्राप्ति और संतान की उन्नति के लिए: कई महिलाएं यह व्रत संतान प्राप्ति, संतान के सुख और दीर्घायु के लिए करती हैं।

कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी की व्रत विधि:

1. व्रत का प्रारंभ:
2. पूजा सामग्री:
3. पूजन विधि:
4. चंद्रमा दर्शन और अर्घ्य:

कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी के दिन क्या करें?

  1. दिनभर व्रत रखें – निर्जला या फलाहार के रूप में।
  2. बार-बार गणेश जी का स्मरण करें – “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का जाप करें।
  3. धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें जैसे कि गणेश पुराण, गणपति अथर्वशीर्ष आदि।
  4. जरूरतमंदों को दान दें – अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़ आदि।
  5. माता-पिता और गुरुओं का आशीर्वाद लें।
  6. चंद्रमा को अर्घ्य देना न भूलें – यह इस दिन का प्रमुख अंग है।

इस दिन क्या न करें?

कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी के लाभ:

1. जीवन से कष्टों की समाप्ति:

इस दिन व्रत करने से व्यक्ति के जीवन से रोग, भय, मानसिक तनाव, आर्थिक कष्ट आदि दूर होते हैं। भगवान गणेश अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।

2. कार्यों में सफलता:

भगवान गणेश को ‘विघ्नहर्ता’ कहा गया है। उनके आशीर्वाद से सभी कार्य सफल होते हैं, चाहे वह शिक्षा हो, व्यवसाय हो या विवाह।

3. पारिवारिक सुख-शांति:

यह व्रत करने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहती है। परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बढ़ता है।

4. संतान सुख:

जो महिलाएं संतान की इच्छा रखती हैं या संतान के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं, उनके लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी होता है।

5. मानसिक शांति और आत्मबल:

गणेश जी की उपासना से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनता है।

6. मोक्ष प्राप्ति:

पुराणों के अनुसार, इस व्रत को विधिपूर्वक करने से पापों का नाश होता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पौराणिक कथा 

पुराणों में एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी थी जिसका पुत्र अत्यंत धर्मनिष्ठ और गणेश भक्त था। एक दिन वह लड़का जंगल में लकड़ियां काटने गया लेकिन रास्ते में उसे सांप ने डस लिया और वह मूर्छित हो गया। उसकी माता ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत करके भगवान गणेश से प्रार्थना की।

गणेश जी उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके पुत्र को पुनः जीवन दान देते हैं। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी एक ऐसा विशेष व्रत है जो भगवान गणेश की विशेष कृपा पाने का उत्तम माध्यम है। यह व्रत संकटों के नाशक और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला होता है। यदि इसे श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए, तो जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं, कार्यों में सफलता मिलती है और जीवन आनंदमय बनता है।

इस दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करना अत्यंत सरल होता है — बस श्रद्धा, भक्ति और नियमों का पालन करें। उनके आशीर्वाद से ही सभी विघ्न दूर होते हैं और जीवन में सुख, शांति, सफलता और संतान सुख की प्राप्ति होती है।

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