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Santan Saptami 2025 | संतान सप्तमी व्रत से संतान को मिलता है लंबा और सुखी जीवन | PDF

भारतीय संस्कृति में हर पर्व और व्रत का कोई न कोई विशेष उद्देश्य छिपा होता है। ये व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि जीवन के गहरे आध्यात्मिक, सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों से भी जुड़े होते हैं। संतान सप्तमी ऐसा ही एक व्रत है जो विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना से किया जाता है। यह व्रत माता-पिता के लिए संतान-सुख को सुरक्षित और मंगलमय बनाने वाला माना गया है।

संतान सप्तमी क्या है?

संतान सप्तमी एक धार्मिक व्रत और पर्व है, जिसे विशेष रूप से भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन संतान की मंगलकामना, दीर्घायु, रोगमुक्ति और उज्ज्वल भविष्य के लिए भगवान सूर्य नारायण, भगवान शिव, माता पार्वती तथा संतान गोपाल (बाल रूप श्रीकृष्ण) की पूजा का विधान है।

इसे कुछ क्षेत्रों में संतान सप्तमी व्रत या संतान सप्तमी पूजा के नाम से भी जाना जाता है। विशेषकर उत्तर भारत, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस व्रत को महिलाएँ अत्यंत श्रद्धा और आस्था से करती हैं।

संतान सप्तमी क्यों मनाई जाती है?

इस व्रत के पीछे मुख्य उद्देश्य संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि है। भारतीय परंपरा में संतान को वंश की निरंतरता और कुल परंपरा को जीवित रखने वाला माना गया है। माता-पिता की सबसे बड़ी आकांक्षा यही होती है कि उनकी संतान स्वस्थ, गुणवान और दीर्घायु बने।

मान्यता है कि—

संतान सप्तमी की व्रत-कथा

संतान सप्तमी व्रत संतान सुख प्रदान करने वाला पावन व्रत है। इसे करने से संतान को उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

एक समय भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के ज्येष्ठ भाई युधिष्ठिर को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का महत्व बताते हुए कहा था—
“हे धर्मराज! इस दिन व्रत करके यदि श्रद्धा से सूर्य देव और लक्ष्मी नारायण की पूजा की जाए, तो संतान सुख की प्राप्ति होती है।”

श्रीकृष्ण ने आगे बताया— “जब मैं माता देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाला था, तब राक्षस कंस उनके प्रत्येक पुत्र को जन्म लेते ही मार डालता था। उस समय लोमश ऋषि ने माता देवकी को संतान सप्तमी व्रत का महत्व बताया। माता ने उनके बताए नियम और विधान के अनुसार इस व्रत का पालन किया। उसी व्रत के प्रभाव से मेरा जन्म हुआ और मैंने कंस के अत्याचार से पृथ्वी को मुक्ति दिलाई।”

राजा नहुष और रानी चंद्रमुखी की कथा

संतान सप्तमी से जुड़ी एक और प्रसिद्ध कथा राजा नहुष की पत्नी रानी चंद्रमुखी की है।

अयोध्या नगरी में नहुष नामक प्रतापी राजा राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम चंद्रमुखी था। रानी की एक प्रिय सखी थी जिसका नाम रूपमती था। एक बार दोनों सहेलियाँ सरयू नदी के तट पर स्नान करने गईं। वहाँ उन्होंने देखा कि अनेक महिलाएँ संतान सप्तमी व्रत का पूजन कर रही हैं।

यह देखकर रानी चंद्रमुखी ने भी अपनी सहेली के साथ यह संकल्प किया कि संतान प्राप्ति के लिए वे भी यह व्रत करेंगी। लेकिन समय बीतने के साथ वे इस व्रत को भूल गईं। कालचक्र चलता रहा और अंततः रानी और उनकी सहेली ने अपना देह त्याग दिया। पुनर्जन्म के चक्र में कई योनियों से होकर दोनों ने मनुष्य शरीर प्राप्त किया।

पुनर्जन्म की कथा

इस जन्म में रानी चंद्रमुखी **ईश्वरी नामक राजकुमारी** बनीं और उनकी सहेली रूपमती एक ब्राह्मण कन्या के रूप में जन्मी।
रूपमती को अपने पूर्वजन्म की घटनाएँ स्मरण थीं। उसने संतान सप्तमी व्रत श्रद्धा से किया और उसके फलस्वरूप उसे आठ संतानें प्राप्त हुईं।

दूसरी ओर, ईश्वरी ने इस व्रत का पालन नहीं किया, जिसके कारण वह निःसंतान रह गई। जब उसने रूपमती की संतानों को देखा तो उसे ईर्ष्या हुई और कई बार उसने उन्हें हानि पहुँचाने का प्रयास किया, किंतु हर बार असफल रही।

आखिरकार ईश्वरी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने रूपमती से क्षमा माँगी। रूपमती ने उसे क्षमा कर समझाया कि यदि वह भी संतान सप्तमी व्रत विधिपूर्वक करेगी तो संतान सुख की प्राप्ति होगी।

रूपमती की बात मानकर ईश्वरी ने श्रद्धा से यह व्रत किया और उसके प्रभाव से वह भी संतान सुख से धन्य हुई।

संतान सप्तमी का महत्व

व्रत-विधि

संतान सप्तमी व्रत करने के लिए कुछ नियम और विधियाँ बताई गई हैं। आइए जानें –

व्रत के पूर्व दिन
व्रत के दिन
पूजन क्रम –

व्रत कथा श्रवण – कथा सुनना या पढ़ना आवश्यक है।

भोजन – पूरे दिन निराहार या फलाहार का नियम है। सायंकाल प्रसाद ग्रहण करें।

विशेष नियम

संतान सप्तमी पर क्या किया जाता है?

संतान सप्तमी के धार्मिक और सामाजिक आयाम

यह व्रत केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को यह सिखाता है कि संतान केवल व्यक्तिगत सुख का साधन नहीं है, बल्कि वह समाज और राष्ट्र की धरोहर भी है। इसीलिए संतानों का पालन-पोषण, शिक्षा और संस्कार देना माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

संतान सप्तमी भारतीय संस्कृति का एक ऐसा अनमोल पर्व है, जो संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि माता-पिता को संतान के प्रति अपने दायित्व की याद भी दिलाता है।

संक्षेप में, इस व्रत का पालन करने से—

इस प्रकार, संतान सप्तमी केवल एक व्रत नहीं बल्कि संतान की रक्षा और सुखद भविष्य का आध्यात्मिक संकल्प है।

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