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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–2 Shalok–37 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो–श्लोक सैंतीस | PDF

अध्याय 2 – सांख्य योग

श्लोक 37

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ 37॥

सरल हिंदी में भावार्थ

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन!
यदि तुम युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे, और यदि युद्ध में विजयी होते हो तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे अर्जुन, दृढ़ निश्चय करके उठो और युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।

विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि धर्मयुक्त कर्तव्य का पालन करने वाले के लिए दोनों ही परिणाम शुभ होते हैं। इसलिए भय, संशय या मोह में पड़े बिना दृढ़ संकल्प के साथ अपना कर्तव्य करना चाहिए।

1. धर्मयुद्ध में हार भी लाभदायक

कृष्ण बताते हैं कि यदि धर्म के लिए युद्ध करते हुए मृत्यु हो जाए तो वह साधारण मृत्यु नहीं होती, बल्कि वीरगति होती है।
ऐसी मृत्यु आत्मा के लिए उच्च लोकों की प्राप्ति का मार्ग बनती है, इसलिए इसमें भी हानि नहीं है।

2. विजय मिलने पर कर्तव्य का फल

यदि अर्जुन युद्ध में विजयी होते हैं, तो उन्हें पृथ्वी का राज्य और उसका धर्मपूर्वक पालन करने का अवसर मिलेगा।
इस प्रकार विजय की स्थिति में भी उनका कर्तव्य और जीवन सफल होता है।

3. दोनों परिणामों में लाभ ही लाभ

इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि धर्मपूर्ण कर्म करने वाले के लिए हार और जीत दोनों ही कल्याणकारी होते हैं।
इसलिए परिणाम की चिंता छोड़कर कर्म करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।

मुख्य बिंदु

धर्मयुक्त कर्म का महत्व – जब कर्म धर्म के लिए हो, तो उसका हर परिणाम कल्याणकारी होता है।

परिणाम से ऊपर कर्तव्य – सच्चा कर्मयोगी परिणाम की चिंता नहीं करता, केवल कर्तव्य निभाता है।

वीरगति का गौरव – धर्म के लिए प्राण देना महान और पवित्र माना गया है।

दृढ़ निश्चय की आवश्यकता – संशय छोड़कर दृढ़ संकल्प से कार्य करना ही सफलता का मार्ग है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक केवल युद्ध की बात नहीं करता, बल्कि जीवन के हर संघर्ष का प्रतीक है।
जब मनुष्य धर्म, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलता है, तब हार और जीत दोनों ही उसकी आध्यात्मिक उन्नति का कारण बनते हैं।

परिणाम की चिंता ही मन में भय और भ्रम उत्पन्न करती है।
जो व्यक्ति निश्चयपूर्वक कर्म करता है, वह अंततः आत्मिक शक्ति और शांति प्राप्त करता है।

पदों का भावार्थ

हतः – मारे जाने पर
प्राप्स्यसि – प्राप्त करोगे
स्वर्गम् – स्वर्गलोक
जित्वा – जीतकर
भोक्ष्यसे – भोगोगे
महीम् – पृथ्वी, राज्य
तस्मात् – इसलिए
उत्तिष्ठ – उठो
कौन्तेय – कुन्तीपुत्र अर्जुन
युद्धाय – युद्ध के लिए
कृतनिश्चयः – दृढ़ निश्चय करके

श्लोक का संदेश

धर्म के मार्ग पर चलने वाले के लिए हार और जीत दोनों ही सार्थक होते हैं।
इसलिए मनुष्य को भय, मोह और परिणाम की चिंता छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन दृढ़ निश्चय के साथ करना चाहिए।

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