
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 33
अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |
तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || 33||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
यदि तुम यह धर्मयुक्त युद्ध नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को त्याग दोगे और पाप की प्राप्ति होगी।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट कर रहे हैं कि युद्ध केवल शक्ति का प्रयोग नहीं है, बल्कि यह क्षत्रिय का स्वधर्म निभाने का अवसर है।
- धर्मयुद्ध का महत्व:
यह युद्ध केवल बाहरी संघर्ष नहीं है, बल्कि धर्म की रक्षा और सत्य की स्थापना का माध्यम है।
- स्वधर्म का पालन:
क्षत्रिय का कर्तव्य धर्म की रक्षा करना है। यदि अर्जुन इस अवसर से पीछे हटता है, तो वह अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा
- कीर्ति और सम्मान:
अपने धर्म का पालन करके अर्जुन अपनी कीर्ति और सम्मान को सुरक्षित रख सकता है। पीछे हटने पर यह कीर्ति खो जाएगी।
- पाप का परिणाम:
अगर अर्जुन इस धर्मयुद्ध से विमुख हो जाता है, तो वह न केवल अपने कर्तव्य का उल्लंघन करेगा, बल्कि पाप का भागीदार भी बनेगा।
मुख्य बिंदु
- कर्तव्य का पालन अनिवार्य – धर्मयुद्ध से पीछे हटना स्वधर्म का त्याग है।
- कीर्ति और सम्मान – सही कर्म करने से वीर की प्रतिष्ठा बढ़ती है।
- पाप से बचाव – कर्तव्य नहीं निभाने पर पाप की प्राप्ति होती है।
- धर्म, साहस और जिम्मेदारी – युद्ध करना केवल शक्ति नहीं, बल्कि धर्म के लिए साहसिक निर्णय है।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
- जीवन में कभी-कभी कठिन निर्णय करना पड़ता है, लेकिन कर्तव्य के मार्ग पर डटे रहना ही आत्मिक और सामाजिक उन्नति का रास्ता है।
- अवसर और परिस्थिति जब धर्म के लिए उचित हों, तो पीछे हटना केवल अवसर का ह्रास नहीं बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक क्षति भी लाता है।
- यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्तव्य से विमुख होना पाप का मार्ग खोलता है, जबकि साहसपूर्वक और विवेकपूर्ण कर्म करना मोक्ष और सम्मान दोनों दिलाता है।
पदों का भावार्थ
- अथ चेत – यदि फिर
- इदं धर्म्यं संग्रामं – यह धर्मयुक्त युद्ध
- न करिष्यसि – नहीं करोगे
- तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा – अपने धर्म और कीर्ति को छोड़कर
- पापमवाप्स्यसि – पाप प्राप्त करोगे
श्लोक का संदेश
- जीवन में धर्म और कर्तव्य का मार्ग कभी भी आसान नहीं होता, लेकिन पिछे हटना पाप और हार का कारण बनता है।
- अवसर जब धर्म का पालन करने का मिले, तो उसे साहस और विवेक के साथ स्वीकार करना चाहिए।
- कर्तव्य पालन ही कीर्ति, सम्मान और आध्यात्मिक उन्नति का स्रोत है।



