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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–2 Shalok–46 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो–श्लोक छियालीस | PDF

अध्याय 2 – सांख्य योग

श्लोक 46

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके |
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः || 46||

सरल हिंदी में भावार्थ

हे अर्जुन!
जिस प्रकार चारों ओर जल से भरे हुए बड़े सरोवर के होने पर छोटे कुएँ की आवश्यकता नहीं रह जाती, उसी प्रकार जो ज्ञानी पुरुष (ब्रह्मज्ञानी) होता है, उसके लिए समस्त वेदों का प्रयोजन सीमित रह जाता है।

विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि जब व्यक्ति उच्चतम ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब बाहरी साधनों और ग्रंथों की आवश्यकता कम हो जाती है।

कुएँ और सरोवर का उदाहरण

कृष्ण एक सरल उदाहरण देते हैं—
जब चारों ओर जल से भरा विशाल सरोवर उपलब्ध हो, तो छोटे कुएँ का महत्व कम हो जाता है।

कुएँ का उपयोग केवल तब तक है जब तक जल की कमी हो। लेकिन जब हर ओर पर्याप्त जल हो, तो उसकी आवश्यकता नहीं रहती।

ज्ञान की पूर्णता का महत्व

इसी प्रकार, वेदों में अनेक प्रकार के कर्म, ज्ञान और उपदेश दिए गए हैं।

परंतु जब कोई व्यक्ति सच्चे आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है, तब उसे इन सभी बाहरी साधनों की उतनी आवश्यकता नहीं रह जाती।
वह सीधे सत्य को अनुभव करने लगता है।

ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि

“ब्राह्मणस्य विजानतः” का अर्थ है—वह व्यक्ति जो ब्रह्म (परम सत्य) को जान चुका है।

ऐसे ज्ञानी के लिए वेदों का उद्देश्य पूरा हो जाता है, क्योंकि वह उस सत्य को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर चुका होता है, जिसे वेद समझाने का प्रयास करते हैं।

साधन और साध्य का अंतर

कृष्ण यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि वेद और कर्मकांड केवल साधन हैं, साध्य नहीं।

अंतिम लक्ष्य है—आत्मज्ञान और परम सत्य की प्राप्ति।
जब यह लक्ष्य प्राप्त हो जाता है, तब साधनों का महत्व स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है।

मुख्य बिंदु

ज्ञान प्राप्ति के बाद साधनों की आवश्यकता घटती है – आत्मज्ञान होने पर बाहरी मार्गदर्शन सीमित हो जाता है।

वेद साधन हैं, साध्य नहीं – उनका उद्देश्य सत्य की ओर ले जाना है।

पूर्णता का अनुभव सर्वोपरि है – प्रत्यक्ष ज्ञान ही सबसे उच्च अवस्था है।

ब्रह्मज्ञानी स्वतंत्र होता है – वह बाहरी नियमों और कर्मकांडों से परे हो जाता है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक यात्रा में ग्रंथ, कर्म और विधियाँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे अंतिम लक्ष्य नहीं हैं।

जब तक व्यक्ति सत्य को नहीं जानता, तब तक ये सभी साधन आवश्यक हैं।
परंतु जब आत्मज्ञान हो जाता है, तब वह व्यक्ति सीधे उस सत्य में स्थित हो जाता है।

कृष्ण का संदेश है कि हमें साधनों में उलझना नहीं चाहिए, बल्कि उनके माध्यम से अंतिम सत्य तक पहुँचना चाहिए।

पदों का भावार्थ

यावान् अर्थः – जितना उपयोग
उदपाने – कुएँ में
सर्वतः सम्प्लुतोदके – चारों ओर जल से भरे सरोवर में
तावान् – उतना ही
सर्वेषु वेदेषु – सभी वेदों में
ब्राह्मणस्य – ब्रह्मज्ञानी के लिए
विजानतः – जानने वाले के लिए

श्लोक का संदेश

जब व्यक्ति सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, तब बाहरी साधनों और कर्मकांडों का महत्व कम हो जाता है।
इसलिए मनुष्य को साधनों में उलझने के बजाय आत्मज्ञान और परम सत्य की प्राप्ति पर ध्यान देना चाहिए।

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