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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–2 Shalok–49 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो–श्लोक उन्चास | PDF

अध्याय 2 – सांख्य योग

श्लोक 49

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय |
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव: || 49||

सरल हिंदी में भावार्थ

हे अर्जुन!
बुद्धियोग (निष्काम कर्म) की तुलना में फल की इच्छा से किया गया कर्म बहुत ही निम्न होता है। इसलिए तू समत्व बुद्धि का आश्रय ले, क्योंकि जो लोग कर्म के फल की इच्छा रखते हैं, वे दीन (कृपण) होते हैं।

विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्म और फल की इच्छा से किए गए कर्म के बीच का अंतर समझाते हैं।

  1. फल की इच्छा से किया गया कर्म निम्न है

कृष्ण कहते हैं कि जो कर्म केवल फल पाने के उद्देश्य से किया जाता है, वह निम्न स्तर का होता है। ऐसे कर्म व्यक्ति को बंधन में डालते हैं और उसे आत्मिक उन्नति से दूर रखते हैं। दुनिया में अधिकांश लोग परिणाम के लिए ही कार्य करते हैं, लेकिन यह दृष्टिकोण सीमित है।

  1. बुद्धियोग (समत्व भाव) का महत्व

बुद्धियोग का अर्थ है – समत्व भाव से कर्म करना, यानी सफलता और असफलता में समान रहना। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इस बुद्धि का आश्रय लो। यह व्यक्ति को स्थिरता, शांति और स्पष्टता प्रदान करती है।

  1. बुद्धि का आश्रय लेना

कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को अपनी बुद्धि को ही मार्गदर्शक बनाना चाहिए।जब बुद्धि स्थिर और संतुलित होती है, तब व्यक्ति सही निर्णय ले पाता है। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को कर्म के बंधन से मुक्त करता है।

  1. फल की इच्छा रखने वाले कृपण हैं

कृष्ण ऐसे लोगों को “कृपण” कहते हैं जो केवल फल के लिए कर्म करते हैं। यह इसलिए क्योंकि वे अपने जीवन की उच्चतम संभावना को नहीं समझ पाते। वे केवल छोटे-छोटे लाभों में ही उलझे रहते हैं और आत्मज्ञान से दूर रह जाते हैं।

मुख्य बिंदु

  • फल की इच्छा से किया गया कर्म निम्न होता है।
  • निष्काम कर्म (बुद्धियोग) श्रेष्ठ है।
  • समत्व भाव से कार्य करना आवश्यक है।
  • स्थिर बुद्धि व्यक्ति को सही मार्ग दिखाती है।
  • फल के पीछे भागना आत्मिक उन्नति में बाधा है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

  • यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल परिणाम प्राप्त करना नहीं है, बल्कि सही भाव से कर्म करना है।
  • जब व्यक्ति फल की इच्छा छोड़कर कर्म करता है, तब वह आंतरिक स्वतंत्रता का अनुभव करता है।
  • कृष्ण का संदेश है कि हमें अपने कर्मों को ईमानदारी से करना चाहिए, लेकिन उनके परिणाम से आसक्त नहीं होना चाहिए।
  • अर्थात, निष्काम कर्म ही सच्ची शांति और मुक्ति का मार्ग है।

पदों का भावार्थ

  • दूरेण – बहुत दूर (त्यागने योग्य)
  • हि – निश्चय ही
  • अवरं कर्म – निम्न कर्म
  • बुद्धि-योगात् – बुद्धियोग (निष्काम कर्म) से
  • धनञ्जय – अर्जुन
  • बुद्धौ – बुद्धि में
  • शरणम् – आश्रय
  • अन्विच्छ – खोजो / ग्रहण करो
  • कृपणाः – दीन / संकीर्ण सोच वाले
  • फल-हेतवः – फल की इच्छा रखने वाले

श्लोक का संदेश

  • फल की इच्छा से किया गया कर्म निम्न है, जबकि निष्काम कर्म श्रेष्ठ है।
  • इसलिए मनुष्य को समत्व बुद्धि का आश्रय लेकर कर्म करना चाहिए और परिणाम की चिंता छोड़ देनी चाहिए।
  • यही सच्ची शांति और आत्मिक मुक्ति का मार्ग है।
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