
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 57
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् |
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 57||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
जो मनुष्य हर जगह आसक्ति से रहित रहता है, और शुभ या अशुभ परिस्थितियाँ प्राप्त होने पर न अत्यधिक प्रसन्न होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर मानी जाती है।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ पुरुष के एक और महत्वपूर्ण गुण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति संसार की परिस्थितियों से प्रभावित होकर न अत्यधिक प्रसन्न होता है और न ही दुखी होकर द्वेष करता है।
सर्वत्र आसक्ति रहित होना
साधारण मनुष्य लोगों, वस्तुओं, संबंधों और परिस्थितियों में आसक्त हो जाता है।
परंतु ज्ञानी पुरुष हर स्थिति में संतुलित रहता है।
वह संसार में रहते हुए भी भीतर से निर्लिप्त रहता है।
शुभ मिलने पर अत्यधिक प्रसन्न न होना
जब सफलता, सम्मान, लाभ या सुख मिलता है, तब सामान्य व्यक्ति अत्यधिक प्रसन्न हो जाता है। लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति समझता है कि यह सब अस्थायी है। इसलिए वह अहंकार या उन्माद में नहीं बहता।
अशुभ मिलने पर द्वेष न करना
जब हानि, अपमान, असफलता या दुःख मिलता है, तब लोग क्रोधित या द्वेषपूर्ण हो जाते हैं। परंतु स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति में भी शांत रहता है। वह परिस्थितियों को समभाव से स्वीकार करता है।
स्थिर बुद्धि की पहचान
जिस व्यक्ति का मन लाभ-हानि, सुख-दुःख, शुभ-अशुभ में समान बना रहता है, वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। उसकी बुद्धि बाहरी घटनाओं से डगमगाती नहीं।
मुख्य बिंदु
- हर परिस्थिति में आसक्ति रहित रहना चाहिए।
- सफलता मिलने पर अहंकार या अत्यधिक हर्ष नहीं होना चाहिए।
- असफलता मिलने पर द्वेष या क्रोध नहीं करना चाहिए।
- शुभ और अशुभ दोनों में समभाव रखना चाहिए।
- ऐसा व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक सिखाता है कि सच्ची शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती।
जब तक मन शुभ-अशुभ, लाभ-हानि, सुख-दुःख से प्रभावित होता रहेगा, तब तक स्थिरता संभव नहीं है।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जानता है कि संसार परिवर्तनशील है। इसलिए वह किसी घटना से अत्यधिक जुड़ता नहीं और न ही किसी स्थिति से घृणा करता है। समत्व ही आत्मिक उन्नति का द्वार है।
पदों का भावार्थ
यः – जो व्यक्ति
सर्वत्र – हर जगह / हर परिस्थिति में
अनभिस्नेहः – आसक्ति रहित
तत् तत् – वह-वह / जैसी भी
प्राप्य – प्राप्त होकर
शुभ-अशुभम् – अच्छा या बुरा
न अभिनन्दति – न अत्यधिक प्रसन्न होता है
न द्वेष्टि – न द्वेष करता है
तस्य – उसकी
प्रज्ञा – बुद्धि
प्रतिष्ठिता – स्थिर / स्थापित है
श्लोक का संदेश
जो व्यक्ति जीवन की हर परिस्थिति में आसक्ति रहित रहता है और शुभ-अशुभ मिलने पर न अधिक प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है—उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि समभाव, संतुलन और वैराग्य ही सच्ची बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं।



