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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–3 Shalok–2 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय तीन–श्लोक दो | PDF

अध्याय 3 – कर्म योग

श्लोक 2

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥2॥

सरल हिंदी में भावार्थ

अर्जुन बोले—
हे श्रीकृष्ण! आपके मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि मानो भ्रमित हो रही है। इसलिए कृपया निश्चित रूप से एक ही मार्ग बताइए, जिससे मैं परम कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।

विस्तृत व्याख्या

अर्जुन का गहरा भ्रम
पहले श्लोक में अर्जुन ने पूछा था कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है, तो उन्हें कर्म करने के लिए क्यों प्रेरित किया जा रहा है।
अब इस श्लोक में वे अपनी मानसिक स्थिति को और स्पष्ट करते हैं।

अर्जुन को ऐसा लग रहा है कि श्रीकृष्ण कभी ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और कभी कर्म करने का उपदेश देते हैं। इससे उनकी बुद्धि भ्रमित हो रही है।

“व्यामिश्र वचन” का अर्थ

“व्यामिश्रेणेव वाक्येन” का अर्थ है — मिले-जुले या मिश्रित वचन।

अर्जुन को यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर मनुष्य के लिए श्रेष्ठ क्या है—

  • संसार त्यागकर ज्ञान का मार्ग अपनाना
    या
  • कर्म करते हुए जीवन जीना।

वे चाहते हैं कि श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से एक निश्चित मार्ग बताएं।

श्रेय की खोज

अर्जुन केवल तात्कालिक सुख नहीं चाहते, बल्कि “श्रेय” अर्थात् परम कल्याण और मोक्ष का मार्ग जानना चाहते हैं।

इसलिए वे भगवान से विनती करते हैं कि ऐसा उपदेश दें जिससे उनका जीवन सफल हो जाए और वे सही मार्ग पर चल सकें।

कर्म योग की शिक्षा की तैयारी

यह श्लोक कर्म योग के मुख्य संदेश की भूमिका तैयार करता है।
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को बताएंगे कि कर्म और ज्ञान विरोधी नहीं हैं।

मनुष्य के लिए कर्म करना आवश्यक है, लेकिन कर्म को निष्काम भाव से करना ही श्रेष्ठ योग है।

मुख्य बिंदु

  • अर्जुन भगवान के उपदेश से भ्रमित महसूस कर रहे हैं
  • उन्हें ज्ञान और कर्म के बीच विरोध दिखाई दे रहा है
  • वे एक निश्चित और स्पष्ट मार्ग जानना चाहते हैं
  • अर्जुन “श्रेय” अर्थात् परम कल्याण की प्राप्ति चाहते हैं
  • यह श्लोक कर्म योग के गहरे सिद्धांत की भूमिका बनाता है

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक हर साधक की मानसिक स्थिति को दर्शाता है।
अक्सर व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में यह सोचकर भ्रमित हो जाता है कि क्या संसार छोड़ देना ही मुक्ति का मार्ग है, या संसार में रहकर कर्म करना भी आध्यात्मिक हो सकता है।

गीता का संदेश यह है कि सच्चा योग कर्म से भागना नहीं, बल्कि सही दृष्टि और निष्काम भावना के साथ कर्म करना है।

पदों का भावार्थ

  • व्यामिश्रेण – मिले-जुले
  • एव – ही
  • वाक्येन – वचनों द्वारा
  • बुद्धिम् – बुद्धि को
  • मोहयसि – भ्रमित करते हैं
  • इव – मानो
  • मे – मेरी
  • तत् – इसलिए
  • एकम् – एक
  • वद – कहिए
  • निश्चित्य – निश्चित करके
  • येन – जिससे
  • श्रेयः – परम कल्याण
  • अहम् – मैं
  • आप्नुयाम् – प्राप्त कर सकूँ

श्लोक का संदेश

जब मनुष्य अनेक विचारों और मार्गों के बीच उलझ जाता है, तब उसे एक स्पष्ट और सत्य मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। अर्जुन का यह प्रश्न हमें सिखाता है कि जीवन में परम कल्याण के लिए स्पष्ट समझ और सही दिशा अत्यंत आवश्यक है।

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