
Yogini Ekadashi 2026
योगिनी एकादशी हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में एक महत्वपूर्ण पर्व है जो भगवान विष्णु को समर्पित है। इसे अषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाया जाता है। योगिनी एकादशी का महत्व भक्ति और श्रद्धा के साथ व्रत और पूजन करने में है, जिससे विष्णु भगवान की कृपा प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
योगिनी एकादशी का महत्व
योगिनी एकादशी के पर्व का महत्व पुराणों में विस्तार से वर्णित है। इसे राजा मुचुकुंद और उनकी पुत्री चंद्रभागा की कहानी से जुड़ा माना जाता है। राजा मुचुकुंद एक धर्मात्मा राजा थे, जिनका पुत्री चंद्रभागा का विवाह शोभन नामक राजकुमार से हुआ था। शोभन को उसके पिछले कर्मों के कारण राक्षस बनने का श्राप लगा था। इस श्राप को दूर करने के लिए चंद्रभागा ने योगिनी एकादशी का व्रत बड़ी भक्ति और त्याग से ध्यान देकर किया। उनकी पूजा और व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने शोभन को शाप से मुक्ति दी।
योगिनी एकादशी 2026: तिथि और शुभ समय
योगिनी एकादशी 2026 का व्रत शुक्रवार, 10 जुलाई 2026 को रखा जाएगा। यह व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा और उपासना के लिए समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने, भगवान विष्णु का पूजन करने और दान-पुण्य करने से पापों का नाश होता है तथा सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
तिथि एवं शुभ समय:
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 9 जुलाई 2026, रात्रि 9:46 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 10 जुलाई 2026, सायं 6:53 बजे
- योगिनी एकादशी व्रत: शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
- पारण (द्वादशी): 11 जुलाई 2026 (पंचांगानुसार)
योगिनी एकादशी का उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है, जहाँ इसे अत्यंत पुण्यदायी व्रत बताया गया है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ, भगवद्गीता का अध्ययन, तुलसी पूजन और जरूरतमंदों को दान करना विशेष फलदायी माना जाता है।
व्रत कथा:
योगिनी एकादशी की कथा के अनुसार, अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नामक राजा का शासन था। उनके राज में एक हेममाली नामक माली था जो प्रतिदिन भगवान शिव के लिए पुष्प लाता था। एक दिन वह अपनी पत्नी के साथ समय बिताने के कारण फूल लाना भूल गया। इस गलती के लिए कुबेर ने उसे शाप दिया कि वह कुष्ठ रोग से पीड़ित हो जाएगा और अपने सभी सुखों से वंचित हो जाएगा।
हेममाली ने ऋषि मार्कंडेय के पास जाकर अपनी समस्या बताई। ऋषि ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत रखने का सुझाव दिया। हेममाली ने विधिपूर्वक व्रत किया, जिसके फलस्वरूप वह अपने पापों से मुक्त हो गया और कुष्ठ रोग से छुटकारा पाया।
पूजा और विधि
योगिनी एकादशी के दिन भक्त उठकर सुबह जल स्नान करते हैं और फिर भगवान विष्णु को समर्पित पूजा-अर्चना करते हैं। वे प्रसाद के रूप में फल, फूल और विशेष भोजन इस पूजा में चढ़ाते हैं और अपने अभिवादन को व्यक्त करते हैं। कई भक्त इस दिन विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करते हैं और भक्तिभाव से गान और कीर्तन करते हैं।
योगिनी एकादशी पर व्रत बड़ा सख्त होता है और इसमें अनाज, दाल और कुछ सब्जियाँ का त्याग किया जाता है। कुछ भक्त सिर्फ जल या दूध पीते हैं, जबकि अन्य फल और अनाज के बिना तैयार किए गए आहार का सेवन करते हैं। व्रत द्वादशी के दिन, सुबह पूजा करने और ब्राह्मणों को अन्नदान करने के बाद तोड़ा जाता है।
योगिनी एकादशी के प्रमुख लाभ:
- पापों का नाश: इस व्रत को करने से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
- स्वास्थ्य लाभ: उपवास करने से शरीर का शुद्धिकरण होता है और स्वास्थ्य में सुधार होता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: इस व्रत से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- आध्यात्मिक उन्नति: व्रतधारी की आध्यात्मिक उन्नति होती है और मन को शांति मिलती है।
आध्यात्मिक महत्व
योगिनी एकादशी को समर्पित करके, भक्तों का मानना है कि इस व्रत से उन्हें अपने पूर्व पापों से क्षमा प्राप्त होती है और विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है। यह एक आध्यात्मिक अवसर है जिसमें भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ ईश्वर के प्रति अपनी समर्पणा को प्रकट करते हैं।
योगिनी एकादशी का महत्व है कि इसे विशेष ध्यान और श्रद्धा से मनाकर, भक्त अपने जीवन में सुख, शांति, और आनंद की प्राप्ति के लिए ईश्वर की कृपा का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। इस अवसर पर विशेष रूप से ब्रह्मचारियों, संन्यासियों, और वैष्णवों को इस व्रत की महत्वपूर्णता को समझकर उसका उचित पालन करना चाहिए।



