
अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग
श्लोक 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥३१॥
(अर्जुन कहते हैं:)
हे केशव! मैं केवल अशुभ लक्षण ही देख रहा हूँ और इस युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर मुझे कोई भी कल्याण (श्रेयो) दिखाई नहीं देता।
गूढ़ व्याख्या / विस्तार से समझाइए:
इस श्लोक में अर्जुन की मानसिक स्थिति अत्यंत विचलित और भावुक हो गई है। युद्ध शुरू होने ही वाला है, और अर्जुन अपने ही परिजनों, गुरुजनों, स्नेहीजनों को अपने सामने खड़ा देख रहे हैं। ऐसे में—
- उन्हें युद्ध से पहले ही अपशकुन जैसे प्रतीत हो रहे हैं।
- उनका अंतरात्मा उन्हें रोक रहा है, और भविष्य में कोई भी भलाई होती नहीं दिख रही।
- वह सोचते हैं कि अपने ही लोगों की हत्या करने से कोई भी धर्म, यश या सुख नहीं मिलेगा।
यह श्लोक अर्जुन की कर्तव्य और करुणा के बीच के संघर्ष को दिखाता है। वह युद्ध के नैतिक पक्ष पर प्रश्न उठाते हैं।
मुख्य बिंदु:
- “निमित्तानि विपरीतानि” यानी अशुभ संकेत – अर्जुन का मन भय, मोह और भ्रम से घिरा हुआ है।
- “न च श्रेयो अनुपश्यामि” – अर्जुन को लगता है कि इस युद्ध से न तो धर्म मिलेगा, न यश, न सुख।
- यह श्लोक अर्जुन के मोह, विषाद और मानसिक संघर्ष की चरम स्थिति को दर्शाता है।
- इस बिंदु से गीता का दार्शनिक संवाद आरंभ होता है।



