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Shrimad Bhagavad Gita Chapter -1 Shalok – 37 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय एक – श्लोक सैंतीस | PDF

अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग

श्लोक 37

अर्जुन उवाच
तस्मात्स्वजनं विमोह्य ययैतदात्मनः तुष्टिषु ।
स्वजनम्‌ अपि चाहं हत्वा बलं गृहाकल्पसे ॥३७॥

हिन्दी भावार्थ:

अर्जुन बोले:
हे मधुसूदन! मैं इनको मारना नहीं चाहता, चाहे ये मुझे मारने के लिए ही क्यों न खड़े हों। मुझे तीनों लोकों का राज्य भी क्यों न मिल जाए, फिर भी मैं केवल पृथ्वी के राज्य के लिए इनको मारना नहीं चाहता।

सरल व्याख्या / विस्तार:

इस श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि —

“हे श्रीकृष्ण! ये जो मेरे कुटुम्बी और संबंधी युद्धभूमि में खड़े हैं — चाहे ये मुझे मारने के लिए ही क्यों न आए हों — मैं इन पर शस्त्र नहीं उठाना चाहता। यहाँ तक कि यदि कोई मुझे तीनों लोकों का (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) राज्य भी दे दे, तब भी मैं केवल इस पृथ्वी के राज्य के लिए इन्हें मारना नहीं चाहता।”

यह अर्जुन के मोह, करुणा और मानसिक द्वंद्व का चरम है। उन्हें लगता है कि:

  • राज्य और वैभव का क्या मूल्य, यदि उसके लिए स्वजनों का वध करना पड़े?
  • धर्म और कर्तव्य के स्थान पर भावुकता और रिश्तों का प्रभाव अधिक हो रहा है।

दार्शनिक संकेत:

  • अर्जुन यहाँ एक ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो धर्मसंकट में है — जहाँ उसे कर्तव्य और भावनात्मक लगाव के बीच चुनाव करना है।
  • यह श्लोक जीवन के उस मोड़ का प्रतीक है जब नैतिकता और आत्मीयता के बीच संघर्ष होता है।
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