Press ESC to close

VedicPrayersVedicPrayers Ancient Vedic Mantras and Rituals

Shrimad Bhagavad Gita Chapter–2 Shalok–23|श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो–श्लोक तेइस|PDF

अध्याय 2 – सांख्य योग

श्लोक 23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: |
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत: || 23||

सरल हिंदी में भावार्थ

हे अर्जुन!
इस आत्मा को कोई भी चीज़ नष्ट नहीं कर सकती।
कोई हथियार इसे काट नहीं सकता, न अग्नि इसे जला सकती है, न जल इसे भिगो सकता है, और न ही वायु इसे सुखा सकती है।
आत्मा शाश्वत है, न जन्म लेती है, न मरती है और न कभी नष्ट होती है।
इसलिए अर्जुन, अपने धर्म और कर्तव्य से कभी भी पीछे मत हटो।

विस्तृत व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह गहरा ज्ञान दे रहे हैं कि आत्मा और शरीर में अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है।

  1. हथियार आत्मा को नहीं काट सकते
    शरीर केवल भौतिक है, और इसे कोई भी तलवार, बाण या हथियार नष्ट कर सकते हैं।
    लेकिन जिस आत्मा में जीवन और चेतना निवास करती है, वह कभी नष्ट नहीं होती।
    यह ज्ञान अर्जुन को युद्ध के समय भयमुक्त बनाता है।
  2. अग्नि आत्मा को नहीं जला सकती
    हम जानते हैं कि अग्नि से शरीर जल सकता है, लेकिन आत्मा के लिए अग्नि की कोई शक्ति नहीं है।
    यह आत्मा के अजर-अमर होने का प्रमाण है।
  3. जल और वायु आत्मा को प्रभावित नहीं कर सकते
    जल से शरीर गीला या नष्ट हो सकता है, वायु से शरीर सूख सकता है।
    परंतु आत्मा पर किसी भी प्रकार का बाहरी प्रभाव नहीं पड़ता।
    आत्मा तत्वों से परे है, इसलिए उसका विनाश संभव नहीं।
  4. आत्मा का अजर-अमर होना
    आत्मा न तो जन्म लेती है और न मरती है।
    वह शरीर के चक्र, सुख-दुख, और जीवन-मृत्यु के प्रभाव से मुक्त है।
    जब हम आत्मा का यह ज्ञान समझते हैं, तो मृत्यु, चोट या किसी भी नुकसान का भय समाप्त हो जाता है।
  5. कर्तव्य पालन में निर्भय होना
    श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताना चाहते हैं कि युद्ध केवल शरीर के लिए खतरनाक नहीं है।
    यदि वह अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करता है, तो आत्मा हमेशा अजर-अमर बनी रहेगी।
    इसलिए भय के कारण धर्म और कर्तव्य से पीछे हटना अनुचित है।

पदों का भावार्थ

  • नैनं – इसे नहीं
  • छिन्दन्ति शस्त्राणि – काट सकते हथियार
  • नैनं दहति पावक: – न ही जला सकती अग्नि
  • न चैनं क्लेदयन्ति आप: – न ही भिगो सकते जल
  • न शोषयति मारुत: – न ही सुखा सकते वायु
  • अमर आत्मा – नष्ट न होने वाली आत्मा

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक जीवन का सबसे गहरा सत्य प्रकट करता है।
मनुष्य जिस शरीर को अपना “मैं” समझता है, वह असल में क्षणभंगुर और नश्वर है।
सच्चा “मैं” आत्मा है, जो न जन्म लेती है, न मरती है, और न कभी नष्ट होती है।

जब व्यक्ति इस ज्ञान को समझता है, तो:

  • उसे मृत्यु का भय नहीं रहता।
  • उसे हानि और नुकसान का डर नहीं सताता।
  • वह अपने कर्तव्य और धर्म में अडिग और निर्भय बन जाता है।

यह ज्ञान हमें कर्मयोग और मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है।
आत्मा के अजर-अमर होने का अनुभव मनुष्य को जीवन में स्थिरता, धैर्य और साहस देता है।

श्लोक का संदेश

  1. आत्मा नश्वर शरीर से परे है और कभी नष्ट नहीं होती।
  2. जीवन का डर, मृत्यु का भय और हानि केवल शरीर पर असर डालते हैं, आत्मा पर नहीं।
  3. धर्म और कर्तव्य का पालन निर्भय होकर करना चाहिए।
  4. आत्मबोध से मनुष्य कर्मयोग और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है।

शरीर क्षणिक है, पर आत्मा शाश्वत है।
यदि हम केवल शरीर के भय से कर्म और धर्म से विमुख होते हैं, तो यह अज्ञान है।
सच्चा ज्ञान यही है कि आत्मा अमर है, और अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा और साहस के साथ निभाना चाहिए।

Join Our Community: Instagram | Twitter | WhatsApp

Stay Connected with Faith & Scriptures

"*" आवश्यक फ़ील्ड इंगित करता है

यह फ़ील्ड सत्यापन उद्देश्यों के लिए है और इसे अपरिवर्तित छोड़ दिया जाना चाहिए।
declaration*