
अध्याय 2 –सांख्य योग
श्लोक 5
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || 5||
सरल हिंदी में भावार्थ
अर्जुन की गहरी भावनात्मक दुविधा को दर्शाया गया है। इस श्लोक में अर्जुन युद्ध के परिणामों, गुरुजनों की हत्या और रक्तरंजित सुखों को लेकर अपने मन का संघर्ष व्यक्त करते हैं। श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो – श्लोक पाँच हमें धर्म, करुणा और कर्तव्य के बीच के द्वंद्व को समझने में सहायता करता है।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में अर्जुन अपने मन की गहरी दुविधा और संवेदना को व्यक्त कर रहा है। वह देखता है कि युद्धभूमि में सामने उसके परम आदरणीय गुरु—द्रोणाचार्य और कृपाचार्य—खड़े हैं।
उनसे युद्ध करके जीत तो मिल सकती है, लेकिन उस विजय का कोई अर्थ नहीं होगा क्योंकि वह अपने ही गुरुओं के वध के बाद प्राप्त होगी।
अर्जुन के मन में निम्न भाव उठ रहे हैं:
- महानुभाव गुरु: द्रोण, कृप आदि उसके लिए केवल योद्धा नहीं बल्कि श्रद्धा और सम्मान के प्रतीक हैं।
- भैक्ष्य जीवन: अर्जुन को लगता है कि ऐसे गुरुओं की हत्या कर जीतने से तो बेहतर है भिक्षा से जीवन बिताना।
- रक्त से लथपथ भोग: यदि वह युद्ध जीत भी लेता है तो उस विजय के फल—राज्य, सुख, धन—उसे पापबोध से भरे, रक्त-सने प्रतीत होंगे।
इस प्रकार, अर्जुन के भीतर का शोक और कर्तव्य-संघर्ष अत्यधिक बढ़ गया है। वह धर्म-संकट में फँसा हुआ है—एक तरफ कर्तव्य, दूसरी तरफ अपने गुरुओं के प्रति आदर और प्रेम।
यही वह मानसिक स्थिति है जहाँ अर्जुन पूरी तरह भ्रमित हो जाता है और निर्णय नहीं ले पाता।
गूढ़ संकेत
यह श्लोक दर्शाता है कि जीवन में जब हमारा कर्तव्य हमारे ही प्रियजनों या आदरणीय व्यक्तियों से टकराने लगे, तो मनुष्य गहरे धर्म-संकट में पड़ जाता है।
अर्जुन का यह प्रश्न केवल युद्ध का प्रश्न नहीं, बल्कि कर्तव्य बनाम संबंधों की शाश्वत दुविधा को दर्शाता है।
यहाँ संदेश यह है:
- पापपूर्ण या मोहजनित निर्णय भले ही भावनाओं से प्रेरित हों, पर वे हमें कर्तव्य से दूर ले जाते हैं।
- मनुष्य को यह समझना होता है कि वास्तविक धर्म क्या है—भावनाओं के आधार पर लिया निर्णय या व्यापक भलाई के लिए किया कर्तव्यपालन?
इसी दुविधा को सुलझाने के लिए आगे भगवान श्रीकृष्ण उसे ज्ञान देना प्रारंभ करते हैं।



