
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 6
न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: |
यानेव हत्वा न जिजीविषाम
स्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: || 6||
सरल हिंदी में भावार्थ:
संजय ने कहा — उस समय अर्जुन गहरे संशय में डूबा हुआ था। वह यह समझ नहीं पा रहा था कि उसके लिए क्या अधिक श्रेष्ठ है — वह युद्ध में विजय प्राप्त करे या उसके शत्रु उसे पराजित कर दें। जिन धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर वह जीवित रहना भी नहीं चाहता, वही सभी इस समय उसके सामने युद्धभूमि में खड़े थे। ऐसी दुविधा की अवस्था में अर्जुन का मन पूरी तरह विचलित हो चुका था।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक महाभारत युद्ध के मैदान कुरुक्षेत्र की उस स्थिति का वर्णन करता है, जब अर्जुन निर्णय लेने की शक्ति खो चुका था। उसके मन में यह स्पष्ट नहीं रह गया था कि युद्ध करना उसके लिए कल्याणकारी होगा या नहीं। विजय और पराजय — दोनों ही स्थितियाँ उसे दुःख से भरी प्रतीत हो रही थीं।
अर्जुन के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि जिन कौरवों को मारकर वह जीत प्राप्त करेगा, उन्हें मारकर वह जीवन जीना ही नहीं चाहता था। वे उसके अपने थे, उसके ही संबंधी थे, और वही इस समय उसके सामने युद्ध के लिए खड़े थे। इस कारण उसका हृदय करुणा, मोह और शोक से भर गया था।
इस श्लोक में संजय धृतराष्ट्र को यह बता रहे हैं कि अर्जुन की मानसिक स्थिति अत्यंत अस्थिर हो चुकी थी। वह न तो युद्ध करने का निश्चय कर पा रहा था और न ही उससे पीछे हटने का साहस जुटा पा रहा था।
“न चैतद्विद्मः” — अर्जुन को यह ज्ञात नहीं है कि उसके लिए क्या श्रेष्ठ है।
“यद्वा जयेम” — विजय भी उसे सुख नहीं दे पा रही है।
“न जिजीविषामः” — जिनको मारकर वह जीना नहीं चाहता, वही उसके सामने खड़े हैं।
ऐसी अवस्था में अर्जुन का विवेक पूरी तरह ढक चुका था।
गूढ़ संकेत (आध्यात्मिक अर्थ):
यह श्लोक यह दर्शाता है कि जब मनुष्य अपने ही संबंधों, भावनाओं और मोह के कारण सही निर्णय नहीं कर पाता, तब उसका विवेक भ्रमित हो जाता है। अर्जुन की यह स्थिति हर उस मनुष्य की स्थिति है, जो जीवन में कर्तव्य और भावना के बीच फँस जाता है।
यहाँ अर्जुन का स्वीकार करना कि वह नहीं जानता कि उसके लिए क्या श्रेष्ठ है — यह उसके अहंकार के टूटने का संकेत है। इसी अवस्था में भगवान श्रीकृष्ण, जो केवल उसके सारथी ही नहीं बल्कि उसके अंतरात्मा के मार्गदर्शक भी हैं, आगे चलकर उसे जीवन का सत्य बताते हैं।
यहीं से श्रीकृष्ण और अर्जुन का वह दिव्य संवाद आरंभ होता है, जो आगे चलकर भगवद गीता के रूप में संपूर्ण मानवता को मार्ग दिखाता है।



