
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || 59||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
जो मनुष्य इन्द्रियों के विषयों से दूर रहता है, उससे विषय तो हट जाते हैं, पर उनमें रहने वाला आसक्ति का रस बना रहता है। परंतु जब वह परम सत्य का अनुभव कर लेता है, तब वह रस भी समाप्त हो जाता है।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण इन्द्रिय संयम की गहराई को समझाते हैं। वे बताते हैं कि केवल बाहरी रूप से विषयों से दूर हो जाना पर्याप्त नहीं है। जब तक मन के भीतर उनका आकर्षण बना रहता है, तब तक पूर्ण विजय नहीं मानी जाती।
विषयों से दूर होना
कई बार मनुष्य परिस्थितियों, नियमों या मजबूरी से विषयों से दूर हो जाता है। जैसे कोई व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन न खाए, मनोरंजन से दूर रहे या सुख-सुविधाओं का त्याग करे। इससे विषय बाहर से हट जाते हैं।
भीतर का रस बना रहता है
यद्यपि बाहरी संपर्क समाप्त हो सकता है, परंतु मन में उनकी इच्छा, स्मृति और आकर्षण बना रह सकता है। यही “रस” है — अर्थात भीतर की आसक्ति। जब तक यह रस जीवित है, तब तक मन फिर विषयों की ओर खिंच सकता है।
परम सत्य का अनुभव
भगवान कहते हैं कि जब मनुष्य परमात्मा के आनंद, आत्मज्ञान या उच्चतर सत्य का अनुभव करता है, तब संसार के विषयों का आकर्षण स्वयं समाप्त हो जाता है। बड़े सुख के सामने छोटे सुख फीके पड़ जाते हैं।
स्थायी वैराग्य क्या है?
सच्चा वैराग्य दबाव से नहीं, बल्कि उच्च अनुभव से आता है। केवल त्याग करने से नहीं, बल्कि परम आनंद पाने से विषयों का रस समाप्त होता है। यही स्थायी संयम है।
स्थिर बुद्धि की पहचान
जिस व्यक्ति ने भीतर से विषयों की आसक्ति छोड़ दी है और जिसने परम आनंद को पा लिया है, उसकी बुद्धि स्थिर और शांत हो जाती है। वह बाहरी वस्तुओं से विचलित नहीं होता।
मुख्य बिंदु
- केवल विषयों से दूर होना पर्याप्त नहीं है।
- मन का आकर्षण बना रहे तो बंधन शेष रहता है।
- भीतर का रस ही आसक्ति का कारण है।
- परम सत्य के अनुभव से विषयों का आकर्षण मिटता है।
- सच्चा वैराग्य उच्च आनंद से उत्पन्न होता है।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक सिखाता है कि इच्छाओं को केवल दबाने से मुक्ति नहीं मिलती। जब तक मन को उच्चतर आनंद नहीं मिलता, वह निम्न सुखों की ओर लौटता रहता है। परमात्मा का अनुभव होने पर मन स्वयं शांत हो जाता है। जहाँ परम रस मिलता है, वहाँ संसार का रस स्वतः समाप्त हो जाता है।
पदों का भावार्थ
विषयाः – इन्द्रियों के विषय
विनिवर्तन्ते – हट जाते हैं / दूर हो जाते हैं
निराहारस्य – सेवन न करने वाले के
देहिनः – देहधारी मनुष्य के
रसवर्जम् – रस को छोड़कर
रसः अपि – वह आसक्ति भी
अस्य – उसके
परम् – परम / श्रेष्ठ
दृष्ट्वा – देखकर / अनुभव करके
निवर्तते – हट जाती है / समाप्त हो जाती है
श्लोक का संदेश
केवल बाहरी त्याग से इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं। जब मनुष्य परमात्मा के श्रेष्ठ आनंद का अनुभव करता है, तब संसार के विषयों की आसक्ति भी मिट जाती है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्चा संयम भीतर से आता है, और आत्मानुभूति ही स्थायी वैराग्य का मार्ग है।



