
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित: |
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन: || 60||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
बहुत प्रयास करने वाला और बुद्धिमान व्यक्ति भी जब इन्द्रियों को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, तब भी ये चंचल और उग्र इन्द्रियाँ उसके मन को बलपूर्वक अपनी ओर खींच लेती हैं।
विस्तृत व्याख्या
संयम के बावजूद संघर्ष
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि आत्म-नियंत्रण का मार्ग बहुत कठिन है। चाहे व्यक्ति कितना भी समझदार और जागरूक क्यों न हो, इन्द्रियों की शक्ति उसे विचलित कर सकती है।
इन्द्रियों का स्वभाव
इन्द्रियाँ स्वभाव से ही चंचल, उग्र और बेचैन होती हैं। इन्हें प्रमाथीनि कहा गया है, जिसका अर्थ है—जो मन को मथ डालने वाली और परेशान करने वाली होती हैं।
मन पर अचानक नियंत्रण
कभी-कभी साधक पूरा प्रयास कर रहा होता है, फिर भी इन्द्रियाँ अचानक मन को अपने प्रभाव में ले लेती हैं। यह दिखाता है कि इन्द्रिय शक्ति कितनी गहरी और तीव्र है।
ज्ञान होने के बाद भी कठिनाई
यह आवश्यक नहीं कि केवल ज्ञान होने से नियंत्रण मिल जाए। एक बुद्धिमान व्यक्ति भी जानता है कि क्या सही है, फिर भी मन और इन्द्रियाँ उसे खींच सकती हैं।
आंतरिक युद्ध का वास्तविक स्वरूप
यह श्लोक बताता है कि आध्यात्मिक जीवन एक निरंतर संघर्ष है—जहाँ मन, बुद्धि और इन्द्रियों के बीच लगातार खींचतान चलती रहती है।
मुख्य बिंदु
- प्रयास करने पर भी इन्द्रियाँ मन को खींच सकती हैं
- इन्द्रियाँ स्वभाव से ही चंचल और शक्तिशाली हैं
- केवल ज्ञान से पूर्ण नियंत्रण नहीं मिलता
- मन पर अचानक आकर्षण का प्रभाव पड़ता है
- आत्मसंयम एक निरंतर अभ्यास है
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
भगवान श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि साधना का मार्ग केवल इच्छा शक्ति पर आधारित नहीं है। इन्द्रियों की गहराई इतनी अधिक है कि वे मन को किसी भी समय विचलित कर सकती हैं। इसलिए साधक को सतत जागरूकता और उच्चतर सहारे की आवश्यकता होती है।
गहरा संदेश यह है:
मनुष्य चाहे कितना भी प्रयास करे, जब तक भीतर की शक्ति मजबूत नहीं होती, इन्द्रियाँ मन को बार-बार खींच सकती हैं।
पदों का भावार्थ
यततः – प्रयास करता हुआ
हि – वास्तव में
अपि – भी
कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
पुरुषस्य – मनुष्य का
विपश्चितः – बुद्धिमान / ज्ञानी
इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ
प्रमाथीनि – चंचल, मथ डालने वाली
हरन्ति – खींच लेती हैं
प्रसभम् – बलपूर्वक
मनः – मन
श्लोक का संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि आत्म-नियंत्रण आसान नहीं है। इन्द्रियाँ बहुत शक्तिशाली होती हैं और प्रयास करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति का मन भी कभी-कभी उनके वश में हो सकता है। इसलिए निरंतर जागरूकता और गहरी साधना आवश्यक है।



