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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–2 Shalok–65 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो–श्लोक पैंसठ | PDF

अध्याय 2 – सांख्य योग

श्लोक 65

प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते |
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || 65||

सरल हिंदी में भावार्थ

हे अर्जुन!
जब मनुष्य को आंतरिक शांति (प्रसाद) प्राप्त होती है, तब उसके सभी दुख नष्ट होने लगते हैं। और जिस व्यक्ति का मन प्रसन्न रहता है, उसकी बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।

विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण आंतरिक शांति और उसके प्रभावों को स्पष्ट करते हैं।

प्रसाद (आंतरिक शांति) का महत्व

कृष्ण कहते हैं कि जब मनुष्य के भीतर “प्रसाद” यानी शांति और संतोष उत्पन्न होता है, तो उसके जीवन के सभी दुख धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।

यह शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि भीतर से आती है।

दुखों का नाश

जब मन शांत और संतुलित होता है, तो व्यक्ति परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता।

इससे मानसिक तनाव, भय और चिंता समाप्त हो जाते हैं।

प्रसन्न चित्त की अवस्था

“प्रसन्न चित्त” का अर्थ है एक ऐसा मन जो संतुष्ट, शांत और सकारात्मक हो।

ऐसा व्यक्ति हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखता है और जीवन को सही दृष्टिकोण से देखता है।

स्थिर बुद्धि की प्राप्ति

कृष्ण कहते हैं कि जब मन प्रसन्न और शांत होता है, तो बुद्धि (निर्णय शक्ति) भी स्थिर और स्पष्ट हो जाती है।

ऐसे व्यक्ति के निर्णय सही और प्रभावी होते हैं।

मुख्य बिंदु

  • आंतरिक शांति से दुखों का नाश होता है
  • प्रसन्न मन जीवन को संतुलित बनाता है
  • शांत मन से सही निर्णय लिए जाते हैं
  • स्थिर बुद्धि सफलता और शांति का आधार है

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति में है।
जब मनुष्य भीतर से शांत और प्रसन्न होता है, तो वह जीवन की हर परिस्थिति को सहजता से संभाल सकता है।

कृष्ण का संदेश है कि शांति ही बुद्धि को स्थिर करती है और जीवन को सही दिशा देती है।

पदों का भावार्थ

प्रसादे – शांति में / प्रसन्नता में
सर्व-दु:खानाम् – सभी दुखों का
हानिः – नाश
अस्य – उसके
उपजायते – उत्पन्न होता है
प्रसन्न-चेतसः – प्रसन्न मन वाले का
हि – निश्चय ही
आशु – शीघ्र
बुद्धिः – बुद्धि
पर्यवतिष्ठते – स्थिर हो जाती है

श्लोक का संदेश

जब मनुष्य को आंतरिक शांति प्राप्त होती है, तो उसके सभी दुख समाप्त हो जाते हैं और उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
इसलिए जीवन में सच्ची शांति और प्रसन्नता ही सही निर्णय और आत्मिक उन्नति का आधार है।

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