
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 68
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश: |
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 68||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे महाबाहु अर्जुन!
जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ सभी विषयों से पूर्ण रूप से नियंत्रित रहती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर और दृढ़ हो जाती है।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों पर नियंत्रण) और स्थिर बुद्धि के संबंध को समझाते हैं।
इन्द्रियों को नियंत्रित करने का महत्व
कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य की इन्द्रियाँ स्वभाव से विषयों की ओर आकर्षित होती हैं।
यदि उन्हें नियंत्रित न किया जाए, तो वे मन और बुद्धि को भटका देती हैं।
लेकिन जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को संयम में रखता है, वह जीवन में स्थिरता प्राप्त करता है।
विषयों से दूरी और आत्मसंयम
यहाँ “इन्द्रियार्थ” का अर्थ है इन्द्रियों के विषय — जैसे रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द।
जो व्यक्ति इन विषयों में अत्यधिक आसक्ति नहीं रखता, वह मानसिक संतुलन बनाए रखता है।
स्थिर बुद्धि की प्राप्ति
कृष्ण बताते हैं कि जब इन्द्रियाँ नियंत्रित होती हैं, तो मन शांत रहता है और बुद्धि स्थिर हो जाती है।
ऐसा व्यक्ति सही निर्णय लेने में सक्षम होता है और मोह से मुक्त रहता है।
आत्मसंयम ही शक्ति है
सच्ची शक्ति बाहरी बल में नहीं, बल्कि अपने मन और इन्द्रियों पर विजय पाने में है।
जो स्वयं पर नियंत्रण रखता है, वही वास्तविक अर्थ में मजबूत और बुद्धिमान है।
मुख्य बिंदु
- इन्द्रियों का नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है
- विषयों में आसक्ति बुद्धि को अस्थिर करती है
- आत्मसंयम से मन शांत और स्थिर रहता है
- नियंत्रित इन्द्रियाँ विवेक को मजबूत बनाती हैं
- स्थिर बुद्धि आध्यात्मिक उन्नति का आधार है
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक सिखाता है कि आत्मिक प्रगति के लिए इन्द्रिय संयम अनिवार्य है।
जब मनुष्य बाहरी आकर्षणों से ऊपर उठता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर और जागरूक बनती है।
कृष्ण का संदेश है कि जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों पर विजय पा लेता है, वही जीवन में सच्ची शांति और ज्ञान प्राप्त करता है।
पदों का भावार्थ
तस्मात् – इसलिए
यस्य – जिसकी
महाबाहो – हे महाबाहु अर्जुन
निगृहीतानि – नियंत्रित की हुई
सर्वशः – सभी प्रकार से
इन्द्रियाणि – इन्द्रियाँ
इन्द्रियार्थेभ्यः – इन्द्रियों के विषयों से
तस्य – उसकी
प्रज्ञा – बुद्धि / विवेक
प्रतिष्ठिता – स्थिर होती है
श्लोक का संदेश
जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ विषयों से नियंत्रित रहती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। इसलिए आत्मसंयम और इन्द्रिय-निग्रह ही शांति, विवेक और आत्मिक उन्नति का सच्चा मार्ग हैं।



