
अध्याय 3 – कर्म योग
श्लोक 23
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥23॥
सरल हिंदी में भावार्थ
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
हे पार्थ (अर्जुन)! यदि मैं सावधानीपूर्वक और निरंतर कर्म न करूँ, तो मनुष्य भी मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए कर्म करना छोड़ देंगे।
विस्तृत व्याख्या
भगवान का आदर्श आचरण
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यद्यपि उन्हें कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है, फिर भी वे निरंतर कर्म करते हैं। इसका कारण यह है कि संसार के लोग उनके आचरण को आदर्श मानते हैं और उसी का अनुसरण करते हैं।
यदि भगवान स्वयं कर्म करना छोड़ दें, तो लोगों को भी यह लगेगा कि कर्म आवश्यक नहीं है।
समाज पर प्रभाव
मनुष्य स्वभाव से आदर्श व्यक्तियों का अनुसरण करता है। जब कोई महान व्यक्ति किसी कार्य को करता है, तो लोग उसे उचित मानकर अपनाने लगते हैं।
इसलिए जिन व्यक्तियों का समाज में सम्मान और प्रभाव होता है, उन्हें अपने कर्मों के प्रति विशेष रूप से सजग रहना चाहिए।
कर्म त्याग का परिणाम
यदि श्रेष्ठ व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन न करें, तो समाज में आलस्य, अव्यवस्था और कर्तव्यहीनता फैल सकती है।
भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनके कर्म केवल व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण समाज और सृष्टि की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हैं।
नेतृत्व का महत्व
एक सच्चा नेता केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि अपने कर्मों से उदाहरण प्रस्तुत करता है। जब नेता स्वयं अनुशासन, कर्तव्य और धर्म का पालन करता है, तब लोग भी उसी मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होते हैं।
यही कारण है कि भगवान स्वयं कर्म करके आदर्श स्थापित करते हैं।
कर्मयोग का संदेश
कर्मयोग सिखाता है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन निरंतर और निष्ठापूर्वक करना चाहिए। उसके कर्म केवल उसके लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकते हैं।
इसलिए कर्म को त्यागने के बजाय उसे ईश्वरार्पण भाव से करना चाहिए।
मुख्य बिंदु
- भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कर्म करके आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
- समाज श्रेष्ठ व्यक्तियों के आचरण का अनुसरण करता है।
- कर्तव्य त्यागने से अव्यवस्था फैल सकती है।
- नेतृत्व का सर्वोत्तम रूप उदाहरण प्रस्तुत करना है।
- कर्मयोग निरंतर और निःस्वार्थ कर्म की शिक्षा देता है।
- व्यक्ति के कर्म समाज को प्रभावित करते हैं।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक बताता है कि हमारे कर्मों का प्रभाव केवल हमारे जीवन तक सीमित नहीं रहता। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में दूसरों के लिए उदाहरण बनता है।
जब हम धर्म, कर्तव्य और निःस्वार्थ सेवा के मार्ग पर चलते हैं, तो हमारे कर्म दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण सम्पूर्ण मानवता के लिए आदर्श स्थापित करते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक सिखाता है कि कर्म त्याग नहीं, बल्कि सही भाव से कर्म करना ही मुक्ति का मार्ग है।
पदों का भावार्थ
यदि – यदि
हि – निश्चय ही
अहम् – मैं
न वर्तेयं – कार्य न करूँ
जातु – कभी भी
कर्मणि – कर्म में
अतन्द्रितः – बिना आलस्य के, सतर्कता से
मम – मेरे
वर्त्म – मार्ग
अनुवर्तन्ते – अनुसरण करते हैं
मनुष्याः – मनुष्य
पार्थ – हे अर्जुन
सर्वशः – सभी प्रकार से
श्लोक का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि महान व्यक्तियों के कर्म समाज के लिए मार्गदर्शक बनते हैं। यदि वे अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करेंगे, तो सामान्य लोग भी उसी मार्ग पर चलेंगे। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए और धर्म तथा कर्तव्य के अनुसार आचरण करना चाहिए। यही कर्मयोग का वास्तविक स्वरूप है।



