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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–3 Shalok–9 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय तीन–श्लोक नौ | PDF

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  • जून 12, 2026

अध्याय 3 – कर्म योग

श्लोक 9

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥9॥

सरल हिंदी में भावार्थ

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन!
यज्ञ अर्थात् ईश्वर और लोककल्याण की भावना से किए गए कर्मों के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म मनुष्य को बंधन में डालते हैं। इसलिए तुम आसक्ति का त्याग करके केवल कर्तव्य और परम उद्देश्य के लिए कर्म करो।

विस्तृत व्याख्या

यज्ञभाव से कर्म करना

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रत्येक कर्म ईश्वर को समर्पित भाव और लोकहित की भावना से किया जाना चाहिए। जब कर्म केवल स्वार्थ, अहंकार या भौतिक लाभ के लिए किए जाते हैं, तो वे कर्मबंधन का कारण बनते हैं।

यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव से किया गया प्रत्येक श्रेष्ठ कर्म भी यज्ञ है।

कर्म और बंधन

मनुष्य अपने कर्मों के फल की इच्छा के कारण उनसे बंध जाता है। सफलता मिलने पर अहंकार और असफलता मिलने पर दुःख उत्पन्न होता है।

लेकिन जब वही कर्म ईश्वर को अर्पित कर दिए जाते हैं, तो वे बंधन नहीं बनते, बल्कि आत्मिक उन्नति का साधन बन जाते हैं।

आसक्ति का त्याग

भगवान कृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि कर्म करो, लेकिन उसके परिणाम से स्वयं को मत जोड़ो।

जब मनुष्य लाभ-हानि, यश-अपयश और सुख-दुःख से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य निभाता है, तब उसका मन शुद्ध और शांत रहता है।

निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत

यह श्लोक कर्मयोग की मूल भावना को प्रकट करता है। कर्म करना आवश्यक है, लेकिन वह कर्म निस्वार्थ और समर्पण भाव से होना चाहिए।

ऐसे कर्म न केवल समाज के लिए लाभकारी होते हैं, बल्कि साधक को आध्यात्मिक स्वतंत्रता भी प्रदान करते हैं।

जीवन को यज्ञ बनाना

श्रीकृष्ण का संदेश है कि जीवन का प्रत्येक कार्य—चाहे वह परिवार, समाज या राष्ट्र के लिए हो—यदि ईश्वरार्पण भाव से किया जाए, तो वह साधना बन जाता है।

ऐसा जीवन व्यक्ति को कर्मबंधन से मुक्त करके परम शांति की ओर ले जाता है।

मुख्य बिंदु

  • यज्ञभाव से किया गया कर्म बंधन नहीं बनता।
  • स्वार्थपूर्ण कर्म मनुष्य को बाँधते हैं।
  • कर्मफल की आसक्ति छोड़ना आवश्यक है।
  • निष्काम कर्म ही कर्मयोग का आधार है।
  • ईश्वर को समर्पित जीवन आध्यात्मिक उन्नति देता है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक सिखाता है कि संसार में कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन कर्मों का उद्देश्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यदि कर्म केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए किए जाएँ, तो वे जन्म-मरण के बंधन को बढ़ाते हैं। परंतु जब वही कर्म ईश्वर, धर्म और लोककल्याण के लिए किए जाते हैं, तो वे साधक को मुक्त करते हैं।

भगवान कृष्ण का संदेश है कि जीवन को एक यज्ञ बनाकर, बिना आसक्ति के कर्म करना ही मुक्ति और आत्मिक शांति का सच्चा मार्ग है।

अर्थात, कर्म नहीं, बल्कि कर्म के पीछे की भावना ही बंधन या मुक्ति का कारण बनती है।

पदों का भावार्थ

यज्ञार्थात् – यज्ञ अथवा ईश्वर के लिए
कर्मणः – कर्मों से
अन्यत्र – इसके अतिरिक्त
लोकः अयम् – यह संसार / मनुष्य
कर्मबन्धनः – कर्मों के बंधन में बंध जाता है
तदर्थम् – उसी उद्देश्य से
कर्म – कर्म करो
कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र अर्जुन
मुक्तसङ्गः – आसक्ति से मुक्त होकर
समाचर – भली-भाँति आचरण करो

श्लोक का संदेश

भगवान श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि जो कर्म ईश्वर और लोककल्याण के लिए किए जाते हैं, वे मनुष्य को बंधन से मुक्त करते हैं। लेकिन स्वार्थ और फल की इच्छा से किए गए कर्म बंधन का कारण बनते हैं। इसलिए प्रत्येक कार्य को समर्पण और निष्काम भाव से करना ही सच्चा कर्मयोग है।

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