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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–4 Shalok–6 | श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय चार–श्लोक छह | PDF

अध्याय 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 6

श्रीभगवानुवाच ।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥6॥

सरल हिंदी में भावार्थ

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, मेरा स्वरूप अविनाशी और शाश्वत है तथा मैं सभी प्राणियों का परमेश्वर हूँ, फिर भी अपनी दिव्य प्रकृति को अपने अधीन करके अपनी योगमाया से इस संसार में प्रकट होता हूँ।

विस्तृत व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण अजन्मा और अविनाशी हैं

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का रहस्य बताते हैं। वे कहते हैं कि वे अजन्मा (अज) हैं और उनका स्वरूप कभी नष्ट या परिवर्तित नहीं होता।

सामान्य जीव जन्म और मृत्यु के चक्र से गुजरता है तथा अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग शरीर प्राप्त करता है। इसके विपरीत भगवान का अस्तित्व शाश्वत है और वे कर्मों के बंधन से परे हैं।

इसलिए भगवान का संसार में प्रकट होना सामान्य जीव के जन्म के समान नहीं है।

भगवान सभी प्राणियों के परमेश्वर हैं

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को सभी प्राणियों का ईश्वर और परम नियंत्रक बताते हैं।

संसार के सभी जीव परमात्मा पर निर्भर हैं, जबकि भगवान किसी भौतिक शक्ति या परिस्थिति पर निर्भर नहीं हैं। वे समस्त सृष्टि के आधार, पालनकर्ता और नियंत्रक हैं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भगवान श्रीकृष्ण का प्रकट होना किसी सामान्य जीव के जन्म के समान नहीं माना जा सकता।

अजन्मा होने का अर्थ

अज का अर्थ है—जिसका जन्म नहीं होता।

भगवान श्रीकृष्ण किसी कर्मफल के कारण जन्म नहीं लेते। उनका अस्तित्व किसी भौतिक कारण पर निर्भर नहीं है। वे अनादि, शाश्वत और अविनाशी हैं।

जब भगवान संसार में प्रकट होते हैं, तो उनका यह प्रकट होना उनकी इच्छा और दिव्य शक्ति के कारण होता है।

अपनी दिव्य प्रकृति को अधीन करके प्रकट होना

भगवान कहते हैं कि वे अपनी स्वयं की प्रकृति को अधीन करके संसार में प्रकट होते हैं।

सामान्य जीव भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन होकर शरीर प्राप्त करता है, लेकिन भगवान भौतिक प्रकृति के नियंत्रण में नहीं होते।

वे अपनी दिव्य शक्ति के माध्यम से अपनी इच्छा के अनुसार संसार में प्रकट होते हैं। इसलिए भगवान का प्रकट होना कर्मबंधन का परिणाम नहीं है।

आत्ममाया द्वारा भगवान का प्रकट होना

श्लोक में “सम्भवाम्यात्ममायया” कहा गया है, जिसका अर्थ है कि भगवान अपनी स्वयं की दिव्य शक्ति से प्रकट होते हैं।

यह शक्ति सामान्य भौतिक माया से भिन्न है। भगवान अपनी योगमाया के द्वारा संसार में दिव्य रूप से प्रकट होते हैं, लेकिन फिर भी वे अपनी शाश्वत और आध्यात्मिक स्थिति में स्थित रहते हैं।

भगवान के दिव्य प्रकट होने और सामान्य जन्म में अंतर

सामान्य जीव का जन्म उसके पूर्व कर्मों से निर्धारित होता है। जीव को भौतिक प्रकृति के नियमों के अनुसार शरीर प्राप्त होता है और वह जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधा रहता है।

भगवान का प्रकट होना इसके विपरीत है। वे कर्म के कारण बाध्य होकर संसार में नहीं आते, बल्कि अपनी इच्छा और दिव्य शक्ति से प्रकट होते हैं।

इसी कारण भगवान का जन्म दिव्य प्रकट होना कहा जाता है।

भगवान के दिव्य स्वरूप को समझना

पिछले श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि उनके और अर्जुन के अनेक जन्म हो चुके हैं, लेकिन भगवान अपने सभी जन्मों को जानते हैं और अर्जुन अपने पिछले जन्मों को नहीं जानते।

अब इस श्लोक में भगवान उस अंतर का कारण बताते हैं। वे अजन्मा, अविनाशी और सभी प्राणियों के परमेश्वर हैं। इसलिए उनका संसार में प्रकट होना सामान्य जीव के जन्म के समान नहीं है।

दिव्य माया का रहस्य

आत्ममाया भगवान की अपनी दिव्य शक्ति को दर्शाती है। भगवान इस शक्ति के द्वारा संसार में प्रकट होते हैं और अपनी दिव्य लीलाएँ करते हैं।

वे भौतिक प्रकृति के अधीन नहीं होते, बल्कि अपनी दिव्य शक्ति के स्वामी होते हैं। यही भगवान के दिव्य स्वरूप की विशेषता है।

ज्ञान कर्म संन्यास योग का व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

यह श्लोक साधक को भगवान के दिव्य स्वरूप को समझने की प्रेरणा देता है।

ज्ञान कर्म संन्यास योग के मार्ग पर साधक यह समझने का प्रयास करता है कि भगवान का कर्म और सामान्य जीव का कर्म एक समान नहीं है।

जब व्यक्ति भगवान को अजन्मा, अविनाशी और परमेश्वर के रूप में समझता है, तब उसके भीतर भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है।

आत्मज्ञान, निःस्वार्थ कर्म और भगवान के प्रति समर्पण के माध्यम से साधक धीरे-धीरे भौतिक आसक्ति से ऊपर उठकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकता है।

मुख्य बिंदु

  • भगवान श्रीकृष्ण अजन्मा और अविनाशी हैं।
  • उनका स्वरूप शाश्वत और दिव्य है।
  • वे सभी प्राणियों के परमेश्वर और नियंत्रक हैं।
  • भगवान कर्म के बंधन के कारण संसार में प्रकट नहीं होते।
  • वे अपनी स्वयं की दिव्य शक्ति से संसार में प्रकट होते हैं।
  • भगवान भौतिक प्रकृति के अधीन नहीं हैं।
  • आत्ममाया भगवान की दिव्य शक्ति को दर्शाती है।
  • भगवान का दिव्य प्रकट होना सामान्य जीव के जन्म से अलग है।
  • भगवान के दिव्य स्वरूप को समझना आध्यात्मिक ज्ञान को गहरा करता है।
  • यह श्लोक भगवान की दिव्यता, शाश्वतता और उनकी योगमाया को समझने का मार्ग दिखाता है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य और शाश्वत स्वरूप को गहराई से समझाता है। भगवान अजन्मा हैं, उनका स्वरूप अविनाशी है और वे सभी प्राणियों के परमेश्वर हैं। फिर भी वे अपनी इच्छा और अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा संसार में प्रकट होते हैं।

इस श्लोक का गहरा संदेश यह है कि भगवान का संसार में प्रकट होना सामान्य जीव के कर्मजनित जन्म के समान नहीं है। भगवान भौतिक प्रकृति के अधीन होकर जन्म नहीं लेते, बल्कि अपनी आत्ममाया अर्थात् दिव्य शक्ति के द्वारा प्रकट होते हैं।

जब मनुष्य भगवान के इस दिव्य स्वरूप को समझता है, तब उसकी आध्यात्मिक दृष्टि विकसित होती है। वह यह समझने लगता है कि भगवान भौतिक बंधनों से परे हैं और उनका प्रकट होना जीवों के कल्याण तथा दिव्य उद्देश्य से जुड़ा है।

भगवान के प्रति ज्ञान, भक्ति और समर्पण विकसित करके साधक अज्ञान तथा भौतिक आसक्ति से ऊपर उठ सकता है और आत्मज्ञान तथा मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

पदों का भावार्थ

श्रीभगवानुवाच – श्रीभगवान ने कहा

अजः – अजन्मा

अपि – यद्यपि

सन् – होते हुए

अव्ययात्मा – अविनाशी एवं शाश्वत स्वरूप वाला

भूतानाम् – सभी प्राणियों का

ईश्वरः – परमेश्वर, परम नियंत्रक

अपि – भी

सन् – होते हुए

प्रकृतिम् – प्रकृति को

स्वाम् – अपनी

अधिष्ठाय – अधीन करके, नियंत्रण में रखकर

सम्भवामि – प्रकट होता हूँ

आत्ममायया – अपनी दिव्य शक्ति या योगमाया से

श्लोक का संदेश

भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे अजन्मा, अविनाशी और सभी प्राणियों के परमेश्वर हैं, फिर भी अपनी दिव्य शक्ति अर्थात् आत्ममाया के द्वारा संसार में प्रकट होते हैं। उनका प्रकट होना सामान्य जीव के कर्मों के कारण होने वाले जन्म के समान नहीं है।

यह श्लोक हमें भगवान के दिव्य स्वरूप, शाश्वत अस्तित्व और योगमाया का रहस्य समझाता है। भगवान भौतिक प्रकृति के अधीन नहीं हैं, बल्कि अपनी दिव्य शक्ति के स्वामी हैं।

भगवान के इस दिव्य स्वरूप को समझकर, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करके और निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हुए साधक भौतिक आसक्ति से ऊपर उठकर आत्मज्ञान, आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

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