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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–4 Shalok–8 | श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय चार–श्लोक आठ | PDF

अध्याय 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥8॥

सरल हिंदी में भावार्थ

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

सज्जनों और धर्मात्माओं की रक्षा करने, दुष्कर्म करने वाले लोगों का विनाश करने तथा धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

विस्तृत व्याख्या

भगवान के अवतार का उद्देश्य

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य अवतार के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से बताते हैं।

पिछले श्लोक में भगवान ने कहा था कि जब-जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब वे स्वयं को प्रकट करते हैं। अब श्लोक 8 में वे बताते हैं कि उनके प्रकट होने के मुख्य उद्देश्य क्या हैं।

भगवान का अवतार तीन प्रमुख उद्देश्यों से जुड़ा है—साधुओं और धर्मात्माओं की रक्षा करना, दुष्कर्म करने वालों के अधर्म का अंत करना तथा धर्म की पुनः स्थापना करना।

साधुओं की रक्षा

यहाँ साधु का अर्थ केवल संन्यासी या किसी विशेष वेशभूषा वाले व्यक्ति से नहीं है।

साधु वह व्यक्ति है जो सत्य, धर्म, सदाचार, करुणा और भगवान के मार्ग पर चलने का प्रयास करता है। जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है और दूसरों के कल्याण की भावना रखता है, वह भी साधुता के गुणों को धारण करता है।

जब ऐसे धर्मनिष्ठ लोगों को अधर्म और अन्याय से पीड़ा होती है, तब भगवान उनकी रक्षा के लिए अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट होते हैं।

दुष्कर्म करने वालों का विनाश

दुष्कृताम् का अर्थ उन लोगों से है जो बुरे कर्मों और अधर्म के मार्ग पर चलते हैं।

भगवान का उद्देश्य केवल दुष्ट व्यक्तियों का शारीरिक विनाश करना ही नहीं है, बल्कि अधर्म, अन्याय, अत्याचार और बुरे कर्मों की शक्ति को समाप्त करना भी है।

जब अधर्म अत्यधिक बढ़ जाता है और निर्दोष लोगों के लिए संकट उत्पन्न करता है, तब भगवान धर्म की रक्षा के लिए उस अधर्म का अंत करते हैं।

इसका गहरा अर्थ यह भी है कि भगवान की दिव्य शक्ति मनुष्य के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे नकारात्मक गुणों को समाप्त करने की प्रेरणा देती है।

धर्म की पुनः स्थापना

इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य धर्मसंस्थापनार्थाय है, अर्थात धर्म की पुनः स्थापना करना।

भगवान केवल अधर्म को समाप्त करने के लिए ही प्रकट नहीं होते, बल्कि धर्म, सत्य, न्याय और सदाचार की व्यवस्था को पुनः स्थापित करने के लिए भी आते हैं।

धर्म की स्थापना का अर्थ समाज और व्यक्ति के जीवन में नैतिक मूल्यों, कर्तव्य, करुणा और सत्य को पुनः जागृत करना है।

जब मनुष्य अपने वास्तविक कर्तव्य और जीवन के उच्च आदर्शों को भूलने लगता है, तब भगवान का दिव्य संदेश उसे सही मार्ग की ओर प्रेरित करता है।

युग-युग में भगवान का प्रकट होना

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—“सम्भवामि युगे युगे”, अर्थात मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

इसका अर्थ है कि जब भी संसार में धर्म का संतुलन बिगड़ता है और अधर्म अत्यधिक बढ़ता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में धर्म की रक्षा और पुनः स्थापना के लिए प्रकट होते हैं।

भगवान का दिव्य मार्गदर्शन केवल किसी एक समय तक सीमित नहीं है। उनका संदेश हर युग और हर परिस्थिति में जीवों को धर्म, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

भगवान की करुणा और न्याय

इस श्लोक में भगवान की करुणा और न्याय दोनों दिखाई देते हैं।

वे धर्मात्माओं और सज्जनों की रक्षा करते हैं, इसलिए उनका स्वरूप करुणामय है। साथ ही वे अधर्म और अत्याचार का अंत करते हैं, इसलिए वे न्याय की स्थापना भी करते हैं।

इस प्रकार भगवान का अवतार केवल किसी संघर्ष का अंत करने के लिए नहीं, बल्कि संसार में संतुलन, न्याय और धर्म की पुनः स्थापना के लिए होता है।

साधक के जीवन में इसका अर्थ

इस श्लोक का संदेश केवल भगवान के अवतार तक सीमित नहीं है। यह प्रत्येक साधक को अपने जीवन में धर्म और अधर्म के बीच अंतर समझने की प्रेरणा देता है।

मनुष्य को अपने भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों—जैसे क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या और स्वार्थ—को पहचानकर उन पर विजय पाने का प्रयास करना चाहिए।

जब व्यक्ति सत्य, करुणा, कर्तव्य और निःस्वार्थ कर्म को अपनाता है, तब वह अपने जीवन में धर्म की स्थापना करता है।

पिछले श्लोक से संबंध

श्लोक 7 में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब वे स्वयं को प्रकट करते हैं।

अब श्लोक 8 में वे अपने प्रकट होने के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं।

साधुओं की रक्षा, दुष्कर्म करने वालों के अधर्म का अंत और धर्म की पुनः स्थापना—यही भगवान के अवतार के प्रमुख उद्देश्य हैं।

इस प्रकार श्लोक 7 और श्लोक 8 मिलकर भगवान के दिव्य अवतार के कारण और उद्देश्य को पूर्ण रूप से स्पष्ट करते हैं।

ज्ञान कर्म संन्यास योग का व्यवहार में प्रयोग

यह श्लोक साधक को अपने जीवन में धर्म की रक्षा करने और अधर्म से दूर रहने की प्रेरणा देता है।

Jnana Karma Sannyasa Yoga के मार्ग पर व्यक्ति को सही ज्ञान के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और अपने कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित करना चाहिए।

साधक को केवल बाहरी संसार में अधर्म को देखने के बजाय अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को भी पहचानना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ और अहंकार पर नियंत्रण प्राप्त करना भी व्यक्तिगत स्तर पर अधर्म का नाश है।

जब व्यक्ति निःस्वार्थ भाव, सत्य और कर्तव्य के साथ कर्म करता है, तब वह धर्म की स्थापना में अपना योगदान देता है।

मुख्य बिंदु

  • भगवान साधुओं और धर्मात्माओं की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।
  • भगवान अधर्म और दुष्कर्म करने वालों की शक्ति का अंत करते हैं।
  • भगवान का प्रमुख उद्देश्य धर्म की पुनः स्थापना करना है।
  • साधु का अर्थ केवल संन्यासी नहीं, बल्कि धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भी है।
  • दुष्टता का विनाश केवल व्यक्तियों का विनाश नहीं, बल्कि अधर्म और बुरी प्रवृत्तियों का अंत भी है।
  • धर्म की स्थापना का अर्थ सत्य, न्याय, कर्तव्य और सदाचार को पुनः स्थापित करना है।
  • भगवान युग-युग में धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।
  • इस श्लोक में भगवान की करुणा और न्याय दोनों का संदेश मिलता है।
  • साधक को अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
  • सत्य, कर्तव्य और निःस्वार्थ कर्म के माध्यम से व्यक्ति धर्म की स्थापना में योगदान दे सकता है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक भगवान के अवतार के दिव्य उद्देश्य को और अधिक स्पष्ट करता है। भगवान केवल बाहरी संसार में अधर्म का अंत करने के लिए ही प्रकट नहीं होते, बल्कि जीवों को धर्म, सत्य और आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करने के लिए भी आते हैं।

साधुओं की रक्षा का एक आंतरिक अर्थ यह है कि भगवान अपने भक्तों और सत्य के मार्ग पर चलने वाले साधकों को आध्यात्मिक शक्ति और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

दुष्कृताम् का विनाश केवल बाहरी दुष्ट शक्तियों के विनाश तक सीमित नहीं है। इसका संबंध मनुष्य के भीतर मौजूद अज्ञान, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ और अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने से भी है।

धर्म की स्थापना का गहरा अर्थ है कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप, कर्तव्य और परमात्मा के साथ अपने संबंध को समझे।

इस प्रकार भगवान का संदेश हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन से अधर्मरूपी नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर करें और सत्य, प्रेम, करुणा तथा निःस्वार्थ कर्म के माध्यम से धर्म की स्थापना करें।

पदों का भावार्थ

परित्राणाय – रक्षा करने के लिए

साधूनाम् – साधुओं और सज्जनों की

विनाशाय – विनाश करने के लिए

– और

दुष्कृताम् – दुष्कर्म करने वालों का

धर्मसंस्थापनार्थाय – धर्म की स्थापना के लिए

सम्भवामि – मैं प्रकट होता हूँ

युगे युगे – युग-युग में, प्रत्येक युग में

श्लोक का संदेश

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सज्जनों और धर्मात्माओं की रक्षा करने, अधर्म और दुष्कर्म का अंत करने तथा धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए युग-युग में प्रकट होते हैं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ और अधर्म की परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, हमें सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। अपने भीतर की बुरी प्रवृत्तियों को दूर करके, निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करके और भगवान के प्रति समर्पित रहकर हम भी अपने जीवन में धर्म की स्थापना कर सकते हैं।

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