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Hal Shashthi 2025 | कब है हल षष्ठी और बलराम जयंती 2025? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि | PDF

  • Vrat
  • अगस्त 13, 2025

हल षष्ठी व्रत क्या है?

हल षष्ठी व्रत, जिसे ललही छठ, हर छठ या बलराम जयंती के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई, भगवान बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को रखा जाता है।

भगवान बलराम की पहचान हल (हुकड़ी) से जुड़ती है, जो उनका प्रमुख अस्त्र और प्रतीक है। कहते हैं कि बलराम ने पृथ्वी पर प्रवेश करने हेतु हल का उपयोग किया था।

धार्मिक और पौराणिक महत्व

  • इस व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार, किसी राजा की संतान के संघर्ष और शोक को देखते हुए, भगवान श्रीकृष्ण ने माता-पिता को संतोष और संतान-दीर्घायु प्रदान करने हेतु यह व्रत बताया। जो भक्त यह व्रत नियमपूर्वक करें, उन्हें संतान की रक्षा, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • लोक-परंपरा में यह व्रत गृहस्थों, विशेषकर महिलाओं द्वारा रखा जाता है, ताकि उनके परिवार में संतति की रक्षा और आशीर्वाद बना रहे।

2025 में हल षष्ठी व्रत — तिथि एवं शुभ मुहूर्त

  • 2025 में हल षष्ठी व्रत की तिथि है 14 अगस्त (भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी), जैसा कि प्रमुख पंचांग बताते हैं।
  • हिन्दू पंचांग 2025 (अगस्त) सूची में भी स्पष्ट उल्लेख है: “14 अगस्त – बलराम जयंती (हल षष्ठी)”।
  • षष्ठी तिथि प्रारंभ और समाप्ति का काल:
    • प्रारंभ: 14 अगस्त, दोपहर लगभग 12:30 बजे
    • समाप्ति: 15 अगस्त, सुबह तक (भी समय संदर्भ मुहूर्त अनुसार अलग हो सकता है।

पूजा विधि और व्रत क्रियाएँ — चरणबद्ध विवरण

(क) व्रत रखने की तैयारी
  • स्नान और व्रत प्रारंभ: प्रातः स्नान के बाद साफ-स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • आंगन सजाना: गोबर से चौकोर चबूतरा बनाकर पूजा स्थल तैयार करें।
  • प्रतिमा/चित्र स्थापना: बलरामजी का छोटा चित्र या प्रतीकात्मक लकड़ी का हल रखें।
(ख) पूजन सामग्री
  • हल्दी, चावल, सात प्रकार के अनाज (सतनाजा), फल और फूल जैसे सामग्रियाँ पूजन में उपयोग करें।
  • विशेष बात यह है कि इस दिन हल (हल चलाए गए मिट्टी या जमीन का आहार) का उपयोग वर्जित होता है। केवल निर्मल अनाज और फल ही ग्रहण करें।
(ग) पूजा स्थलीय सीमा
  • व्रती महिलाएं महुआ की दातुन करें, भोजन में चम्मच की जगह महुआ लकड़ी का उपयोग करें, महुआ पत्ते से बने पात्रों (दोन, पत्तल) में ही भोजन ग्रहण करें।
(घ) कथा वाचन
  • व्रत कथा सुनना अत्यन्त शुभ माना जाता है। कथा सुनने से जीवन में सुख-समृद्धि, संतान की रक्षा, विषेश आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।
(ङ) व्रत का समापन
  • व्रत की समाप्ति तिथि (15 अगस्त) की प्रातः ठीक समय (ऋतु अनुसार) पर हल-चले अन्न और हल का उपयोग न करते हुए भोजन ग्रहण करें।

सामाजिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व

  • यह व्रत संतान सुख, दीर्घायु, पारिवारिक समृद्धि हेतु किया जाता है।
  • साथ ही बलरामजी के आदर्श — शक्ति, करुणा, स्थिरता — जीवन में स्थापित होती हैं।
  • सामाजिक दृष्टि से, व्रत और पूजा-संस्कृति से भारतीय परम्पराओं का आदर और अगली पीढ़ी में जागरूकता बनी रहती है।

सारांश: महत्वपूर्ण तथ्य

विषय संक्षिप्त विवरण
व्रत क्यों भगवान बलराम का जन्मोत्सव, संतान की रक्षा एवं दीर्घायु हेतु
2025 तिथि 14 अगस्त (भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी)
पूजा विधि गोबर चौकोर, हल का प्रतिबंध, अनाज-फलों का उपयोग, कथा वाचन
हाईलाइट महुआ दातुन, महुआ लकड़ी की बर्तन उपयोग, हल-चले अन्न से परहेज
मूल लाभ संतान आशीर्वाद, पारिवारिक सुख-शांति, आध्यात्मिक शुद्धि

 

हल षष्ठी व्रत हिन्दू परम्परा का एक सुंदर और सार्थक व्रत है, जो भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसके द्वारा संतान, परिवार, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक कल्याण की कामना की जाती है।

2025 में यह व्रत 14 अगस्त को है, और इसकी पूजा विधियाँ पारंपरिक रूप से सरल किंतु गहन अर्थों से भरी हैं—चाहे वह महुआ दातुन हो, बिना हल के भोजन, कथा वाचन, या संकल्प की भावना।

यह व्रत सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक-आध्यात्मिक चेतना का भी प्रतीक है। आप, अपने माता-पिता या परिवार में महिलाएं—यदि इस व्रत का आयोजन करें—तो यह उनकी आस्था और संस्कृति को सशक्त बनाने का माध्यम बनेगा।

शुभ हल षष्ठी!

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