
रवि प्रदोष व्रत क्या है?
रवि प्रदोष व्रत वह प्रदोष व्रत है जो रविवार के दिन आने वाली त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित माना जाता है, लेकिन रविवार होने के कारण इसमें सूर्य देव की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत आरोग्य, तेज, ऊर्जा और समृद्धि प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
रवि प्रदोष व्रत: तिथि और समय
रवि प्रदोष व्रत हमेशा रविवार को पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि को ही आता है। पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय प्रदोष काल होता है।
प्रदोष काल समय:
सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले से लेकर सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक।
प्रदोष व्रत प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है. इस बार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 28 फरवरी 2026 की रात 08 बजकर 05 मिनट से आरंभ होकर 1 मार्च की शाम 06 बजकर 30 मिनट तक रहेगी.
इसलिए रवि प्रदोष व्रत 1 मार्च 2026, रविवार को ही रखा जाएगा।
रवि प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
- यह व्रत सूर्य देव और भगवान शिव दोनों की कृपा प्रदान करता है।
- इससे जीवन में शक्ति, तेज, ऊर्जा और सकारात्मकता बढ़ती है।
- पितृ दोष, सूर्य दोष और गृह बाधाओं से राहत मिलती है।
- व्रतधारी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से लाभ मिलता है।
- घर-परिवार में शांति और समृद्धि आती है।
- यह व्रत मनोकामना पूर्ण करने वाला माना गया है।
रवि प्रदोष व्रत की विधि (Step by Step)
1. प्रातःकालीन तैयारी
- स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- व्रत का संकल्प लें कि आप भगवान शिव और सूर्य देव की कृपा हेतु व्रत रख रहे हैं।
- दिनभर संयम और शांत भाव बनाए रखें।
2. दिनभर का आचार
- फलाहार या निर्जल उपवास रखा जा सकता है।
- नकारात्मक विचार, क्रोध और विवाद से बचें।
- शिव नाम का स्मरण करते रहें।
3. प्रदोष काल में पूजा
पूजा सामग्री:
जल, दूध, गंगाजल, बेलपत्र, चंदन, सफेद फूल, धूप, दीपक, नैवेद्य, रेशमी वस्त्र, अक्षत।
पूजा प्रक्रिया:
- शिवलिंग का जल, दूध और गंगाजल से अभिषेक करें।
- शिवलिंग पर बेलपत्र, चंदन और फूल अर्पित करें।
- दीपक जलाएँ और “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
- सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें।
- शिव चालीसा और प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें।
- अंत में आरती करें।
रवि प्रदोष व्रत की कथा
शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि एक निर्धन ब्राह्मण अपने परिवार के साथ अत्यंत कष्ट में जीवन बिता रहा था। एक दिन रविवार को प्रदोष तिथि पड़ने पर उसने शिव उपासना का निश्चय किया। उसने पूर्ण श्रद्धा के साथ व्रत रखा और प्रदोष काल में शिवजी का पूजन किया।
व्रत के प्रभाव से उसकी सभी परेशानियाँ धीरे-धीरे दूर होने लगीं। उसे रोजगार, धन, सुख और समृद्धि प्राप्त हुई। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि रवि प्रदोष व्रत करने से सभी बाधाएँ दूर होती हैं और जीवन में सौभाग्य बढ़ता है।
रवि प्रदोष व्रत के लाभ
स्वास्थ्य लाभ
सूर्य देव की कृपा से शरीर में ऊर्जा, बल और रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
पितृ दोष निवारण
ज्योतिष के अनुसार, यह व्रत पितृ दोष और सूर्य जनित ग्रह बाधाओं को शांत करता है।
आर्थिक समृद्धि
नौकरी, प्रमोशन, व्यापार और धन लाभ में सफलता मिलती है।
मानसिक शांति
व्रत से मन शांत होता है, तनाव कम होता है और घर में सुख-शांति बढ़ती है।
दीर्घायु और तेज
यह व्रत स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करता है।
कौन रखें रवि प्रदोष व्रत?
- जिनकी कुंडली में सूर्य दोष या पितृ दोष हो।
- जो स्वास्थ्य समस्याओं से परेशान हों।
- जिनके करियर या धन संबंधी बाधाएँ हों।
- जो आत्मिक और मानसिक शांति चाहते हों।
- जिन्हें तेज, ऊर्जा और सकारात्मकता चाहिए।



