
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 25
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || 25||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
इस आत्मा का स्वरूप बहुत ही अद्भुत और दिव्य है। यह आत्मा अव्यक्त है, यानी इसे हमारी इंद्रियाँ नहीं देख सकतीं। यह अचिन्त्य है, यानी इसे पूरी तरह से हमारी बुद्धि या सोच से समझा नहीं जा सकता। और यह अविकार्य है, यानी यह कभी बदलती नहीं है, न ही इसमें कोई विकार या नुकसान हो सकता है।
इसलिए, अर्जुन, जब तुम इस आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान जाओ, तो तुम्हें किसी भी प्रकार का शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि आत्मा न कभी मरती है और न ही नष्ट होती है।
विस्तृत व्याख्या
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को आत्मा के दिव्य स्वरूप की गहन समझ दे रहे हैं। उन्होंने इसे तीन मुख्य गुणों में बाँटा है – अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य।
आत्मा अव्यक्त है (दिखाई नहीं देती)
- आत्मा ठोस नहीं है, इसलिए इसे आँखों से नहीं देखा जा सकता।
- यह हमारे इंद्रियों की पकड़ से पूरी तरह परे है।
- इसलिए साधारण व्यक्ति इसे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव नहीं कर पाता।
- जैसे हवा को हम नहीं देख सकते, लेकिन उसका अस्तित्व महसूस कर सकते हैं, वैसे ही आत्मा भी अदृश्य है।
आत्मा अचिन्त्य है (बुद्धि से परे)
- आत्मा का स्वरूप इतनी गहन और अद्भुत है कि इसे तर्क, गणना या कल्पना से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
- यह मानव बुद्धि की सीमाओं से परे है।
- हम इसे समझने की कोशिश कर सकते हैं, पर उसकी पूर्णता कभी नहीं पकड़ सकते।
- इसलिए इसे केवल अनुभव और आंतरिक समझ से ही जाना जा सकता है।
आत्मा अविकार्य है (अपरिवर्तनीय)
- आत्मा में कभी कोई परिवर्तन, नुकसान या नाश नहीं होता।
- यह जन्म और मृत्यु, सुख और दुख, समय और परिस्थिति से प्रभावित नहीं होती।
- यह हमेशा एक-सी रहती है और नित्य, शाश्वत और अमर है।
- इस गुण के कारण आत्मा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता, न ही उसे किसी रूप में बदलना संभव है।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
- इस श्लोक के माध्यम से भगवान कृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि आत्मा इतनी सूक्ष्म और दिव्य है कि उसे हमारी इंद्रियाँ नहीं देख सकतीं और न ही हमारी बुद्धि पूरी तरह समझ सकती है।
- जब कोई साधक इस सत्य को जान लेता है कि आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य है, तो उसके मन से शरीर, मृत्यु और जीवन से जुड़ा शोक और भय दूर हो जाता है।
- यह ज्ञान हमें मानसिक स्थिरता, साहस और शांति प्रदान करता है।
- इस समझ के साथ, व्यक्ति अपने कर्तव्यों और धर्म के मार्ग पर शांति, दृढ़ता और विश्वास के साथ चल सकता है।
पदों का भावार्थ
- अव्यक्त: जो प्रकट नहीं है, जिसे देखा नहीं जा सकता
- अचिन्त्य: जिसे पूरी तरह सोच या समझ नहीं सकता
- अविकार्य: जिसमें कोई परिवर्तन या नाश नहीं होता
- उच्यते: ऐसा कहा गया है
- तस्मात्: इसलिए
- एवं: इस प्रकार
- विदित्वा: जानकर
- एनम्: इस आत्मा को
- न: नहीं
- अनुशोचितुम्: शोक करने के लिए
- अर्हसि: तुम योग्य हो
श्लोक का संदेश
- आत्मा हमारी इंद्रियों से परे है।
- आत्मा को हमारी बुद्धि पूरी तरह समझ नहीं सकती।
- आत्मा में कोई परिवर्तन, विकार या नाश नहीं होता।
- इस सत्य को जानकर शोक करना उचित नहीं है।
धर्म और कर्तव्य का पालन शोक और भय से ऊपर उठकर करना चाहिए।



