
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 26
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् |
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि || 26||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
यदि तुम ऐसा मान भी लो कि आत्मा बार-बार जन्म लेती है और बार-बार मरती है — अर्थात वह नित्य जन्मी और नित्य मरणशील है — तो भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
क्योंकि जो जन्म लेता है, वह एक दिन अवश्य मरता है, और जो मरता है, वह पुनः जन्म लेता ही है।
इस प्राकृतिक नियम को जानते हुए शोक करना बुद्धिमानी नहीं है।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण एक कल्पना-आधारित तर्क का प्रयोग करते हैं।
वे कहते हैं कि—
1. यदि आत्मा को नित्य जन्म लेने वाली माना जाए
कुछ लोग मानते हैं कि आत्मा हर बार नया जन्म लेती है।
यदि किसी का विश्वास ऐसा है, तो भी जन्म का आना और मृत्यु का होना — यह दोनों एक प्राकृतिक चक्र हैं।
जैसे सूर्योदय के बाद सूर्यास्त निश्चित है, वैसे ही जन्म के बाद मृत्यु निश्चित है।
2. यदि आत्मा को नित्य मरने वाली माना जाए
कुछ लोग यह सोच सकते हैं कि मृत्यु के बाद सब समाप्त हो जाता है, आत्मा भी नहीं रहती।
यदि ऐसा मान भी लिया जाए, तो भी मृत्यु के बाद कुछ शेष नहीं रहता, फिर शोक किसका?
3. इस तर्क का उद्देश्य
कृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि —
चाहे आत्मा को अमर मानो या नश्वर, दोनों ही स्थितियों में शोक का कोई आधार ही नहीं है।
इसलिए मृत्यु एक प्राकृतिक घटना है।
जो प्राकृतिक और अनिवार्य है, उस पर दुख करने से कोई लाभ नहीं।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
- भगवान कृष्ण अत्यंत गहन मनोवैज्ञानिक पद्धति से अर्जुन को समझा रहे हैं।
- वे पहले आत्मा की अमरता सिद्ध करते हैं, लेकिन यदि किसी को यह समझ न आए, तो एक दूसरी दिशा से तर्क देते हैं।
- यह दर्शाता है कि सत्य तक पहुँचने के लिए अलग-अलग मार्ग अपनाए जा सकते हैं।
- चाहे कोई आत्मा को अमर माने या उसकी नश्वरता में विश्वास रखे — दोनों ही धारणाएँ शोक का कारण नहीं बननी चाहिए।
- यह दृष्टिकोण मन को व्यापक बनाता है, और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है।
पदों का भावार्थ
- अथ – यदि
- च एनम् – इस आत्मा को
- नित्यजातम् – हमेशा जन्म लेने वाला
- नित्यं मृतम् – हमेशा मरने वाला
- मन्यसे – यदि तुम ऐसा मानते हो
- तथापि – तब भी
- त्वं महाबाहो – हे पराक्रमी अर्जुन
- न एवम् – इस प्रकार
- शोचितुम् – शोक करने के लिए
- अर्हसि – योग्य नहीं हो
श्लोक का संदेश
- जन्म और मृत्यु प्रकृति के निश्चित नियम हैं।
- जिस पर हमारा नियंत्रण नहीं, उस पर शोक करना व्यर्थ है।
- चाहे आत्मा अमर हो या नश्वर — दोनों ही स्थितियों में शोक उचित नहीं।
- जीवन में कर्तव्य को शोक और मोह से ऊपर उठकर करना चाहिए।



