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Shrimad Bhagavad Gita Chapter–2 Shalok–39 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो–श्लोक उनतालीस | PDF

अध्याय 2 – सांख्य योग

श्लोक 39

एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39||

सरल हिंदी में भावार्थ

हे अर्जुन!
अब तक मैंने तुम्हें ज्ञान (सांख्य) के विषय में समझाया है, अब तुम कर्मयोग की बुद्धि को सुनो।
इस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाओगे।

विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान से कर्म की ओर ले जाते हैं। वे बताते हैं कि केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना भी आवश्यक है।

1. ज्ञान से कर्म की ओर

कृष्ण कहते हैं कि आत्मा का ज्ञान (सांख्य) तुम्हें समझा दिया गया है।
अब वे बताते हैं कि उस ज्ञान को कर्म में कैसे लागू किया जाए।

ज्ञान मार्ग दिखाता है, लेकिन कर्म उस मार्ग पर चलना सिखाता है।

2. कर्मयोग की बुद्धि

कर्मयोग का अर्थ है—

  • अपने कर्तव्य को करना
  • बिना फल की इच्छा के कर्म करना
  • मन को स्थिर और संतुलित रखना

जब व्यक्ति सही समझ के साथ कर्म करता है, तो उसका हर कर्म शुद्ध हो जाता है।

3. कर्म बंधन से मुक्ति

सामान्यतः कर्म व्यक्ति को बाँधते हैं क्योंकि वे इच्छा, मोह और अहंकार से किए जाते हैं।

लेकिन जब वही कर्म सही बुद्धि और निष्काम भाव से किए जाते हैं, तो वे बंधन नहीं बनते। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी उनसे मुक्त रहता है।

4. बुद्धि का महत्व

यहाँ “बुद्धि” का अर्थ है—सही समझ और स्थिर विचार।

ऐसी बुद्धि वाला व्यक्ति:

  • भ्रमित नहीं होता
  • हर परिस्थिति में शांत रहता है
  • अपने कर्तव्य को स्पष्टता से निभाता है

यही बुद्धि व्यक्ति को कर्म के बंधनों से मुक्त करती है।

मुख्य बिंदु

  • ज्ञान को कर्म में उतारना आवश्यक है।
  • कर्मयोग सही समझ के साथ किया गया कर्म है।
  • निष्काम कर्म से बंधन समाप्त होते हैं।
  • स्थिर बुद्धि ही मुक्ति का मार्ग है।
  • ज्ञान और कर्म का संतुलन जीवन को पूर्ण बनाता है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक सिखाता है कि केवल ज्ञान प्राप्त करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है। जब तक उस ज्ञान को जीवन में लागू नहीं किया जाता, तब तक सच्ची प्रगति नहीं होती।

जब व्यक्ति सही बुद्धि के साथ, बिना किसी आसक्ति के कर्म करता है:

  • उसका मन शुद्ध होता है
  • वह कर्मों के प्रभाव से मुक्त होता है
  • वह आत्मिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है

अर्थात, सही समझ के साथ किया गया कर्म ही मुक्ति का मार्ग है।

पदों का भावार्थ

  • एषा – यह
  • ते – तुम्हें
  • अभिहिता – कहा गया है
  • साङ्ख्ये – ज्ञान में
  • बुद्धिः – बुद्धि / समझ
  • योगे – कर्मयोग में
  • तु – अब
  • इमाम् – इस
  • शृणु – सुनो
  • बुद्ध्या युक्तः – बुद्धि से युक्त होकर
  • यया – जिससे
  • पार्थ – हे अर्जुन
  • कर्मबन्धम् – कर्मों का बंधन
  • प्रहास्यसि – छोड़ दोगे / मुक्त हो जाओगे

श्लोक का संदेश

जीवन में केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान के अनुसार कर्म करना आवश्यक है।

जो व्यक्ति सही बुद्धि और निष्काम भाव से अपने कर्तव्य का पालन करता है, वह कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।

ज्ञान और कर्म का संतुलन ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।

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