
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 40
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || 40||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
इस कर्मयोग में किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता और न ही इसमें कोई हानि होती है।
इस धर्म का थोड़ा सा अभ्यास भी मनुष्य को बड़े भय से बचा लेता है।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण कर्मयोग की महानता और उसकी विशेषता बताते हैं। वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि इस मार्ग पर किया गया हर छोटा प्रयास भी अत्यंत मूल्यवान होता है।
1. प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता
कृष्ण कहते हैं कि इस मार्ग में किया गया कोई भी कर्म नष्ट नहीं होता।
दुनिया के कार्यों में कभी-कभी प्रयास असफल हो सकते हैं, लेकिन कर्मयोग में ऐसा नहीं है।
यहाँ किया गया हर प्रयास व्यक्ति की आत्मिक प्रगति में जुड़ता जाता है।
2. हानि का कोई भय नहीं
सामान्य कर्मों में गलती या असफलता का डर रहता है।
लेकिन कर्मयोग में ऐसा कोई नकारात्मक परिणाम नहीं होता।
यदि प्रयास अधूरा भी रह जाए, तब भी वह व्यर्थ नहीं जाता और भविष्य में लाभ देता है।
3. थोड़े अभ्यास का भी बड़ा लाभ
कृष्ण बताते हैं कि इस मार्ग का थोड़ा सा अभ्यास भी बहुत शक्तिशाली होता है।
- थोड़ी सी साधना
- थोड़ी सी निष्काम भावना
- थोड़ा सा संतुलन
भी मनुष्य के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
4. बड़े भय से रक्षा
यह “महान भय” क्या है?
यह जन्म-मरण का चक्र, असुरक्षा, दुख और मानसिक अशांति का भय है।
कर्मयोग का अभ्यास व्यक्ति को इन सबसे बचाता है और उसे स्थिरता व शांति देता है।
मुख्य बिंदु
- कर्मयोग में कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
- इस मार्ग में असफलता या हानि का भय नहीं है।
- थोड़े अभ्यास से भी बड़ा लाभ मिलता है।
- यह जीवन के बड़े भय से रक्षा करता है।
- निरंतर प्रयास आत्मिक उन्नति लाता है।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक हमें विश्वास और प्रेरणा देता है।
आध्यात्मिक मार्ग पर चलते समय व्यक्ति को यह डर हो सकता है कि कहीं उसका प्रयास अधूरा या व्यर्थ न हो जाए।
कृष्ण इस भय को दूर करते हैं।
वे बताते हैं कि इस मार्ग पर उठाया गया हर छोटा कदम भी महत्वपूर्ण है।
यह धीरे-धीरे मन को शुद्ध करता है और व्यक्ति को आत्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है।
अर्थात, कर्मयोग का छोटा सा अभ्यास भी जीवन को सुरक्षित और अर्थपूर्ण बना देता है।
पदों का भावार्थ
- न इह – यहाँ नहीं
- अभिक्रम-नाशः – प्रयास का नाश
- अस्ति – होता है
- प्रत्यवायः – हानि / विपरीत परिणाम
- न विद्यते – नहीं होता
- स्वल्पम् अपि – थोड़ा सा भी
- अस्य धर्मस्य – इस धर्म का
- त्रायते – बचाता है
- महतः भयात् – बड़े भय से
श्लोक का संदेश
कर्मयोग का मार्ग सुरक्षित और फलदायी है।
इसमें किया गया कोई भी प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता, और थोड़ा सा अभ्यास भी जीवन के बड़े भय से बचाता है।
निरंतर छोटे-छोटे प्रयास ही अंततः आत्मिक मुक्ति का मार्ग बनाते हैं।



