
अध्याय 2 – सांख्य योग
श्लोक 51
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् || 51||
सरल हिंदी में भावार्थ
हे अर्जुन!
बुद्धियोग से युक्त ज्ञानी लोग कर्मों के फल का त्याग करके जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और दुखरहित परम पद को प्राप्त करते हैं।
विस्तृत व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि निष्काम कर्म और बुद्धियोग के द्वारा मनुष्य कैसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त कर सकता है।
- कर्मफल का त्याग (फल त्याग)
कृष्ण कहते हैं कि बुद्धियोग से युक्त ज्ञानी व्यक्ति अपने कर्मों के फल का त्याग कर देता है।
वह कर्म तो करता है, लेकिन उसके परिणाम से आसक्त नहीं होता।
यही निष्काम कर्म का मूल सिद्धांत है।
- ज्ञानी (मनीषी) का मार्ग
मनीषी अर्थात ज्ञानी व्यक्ति समझता है कि फल की इच्छा ही बंधन का कारण है।
इसलिए वह कर्म करते हुए भी अपने मन को परिणामों से अलग रखता है।
यह दृष्टिकोण उसे आंतरिक शांति प्रदान करता है।
- जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति
सामान्यतः मनुष्य अपने कर्मों के कारण जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधा रहता है।
लेकिन जो व्यक्ति फल की आसक्ति छोड़ देता है,
वह इस चक्र से मुक्त हो जाता है।
यह मुक्ति ही आध्यात्मिक जीवन का मुख्य लक्ष्य है।
- दुखरहित परम पद की प्राप्ति
कृष्ण कहते हैं कि ऐसे ज्ञानी लोग “अनामय पद” को प्राप्त करते हैं।
यह वह अवस्था है जहाँ कोई दुख, रोग या अशांति नहीं होती।
यह पूर्ण शांति, आनंद और आत्मिक स्वतंत्रता की स्थिति है।
मुख्य बिंदु
- कर्म के फल का त्याग आवश्यक है।
- निष्काम कर्म ही सच्चा मार्ग है।
- ज्ञानी व्यक्ति आसक्ति से मुक्त रहता है।
- यह मार्ग जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करता है।
- अंततः परम शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
- यह श्लोक हमें सिखाता है कि बंधन का कारण कर्म नहीं, बल्कि उसके फल की आसक्ति है।
- जब व्यक्ति फल की इच्छा छोड़ देता है, तो वह कर्म करते हुए भी बंधता नहीं है।
- कृष्ण का संदेश है कि निष्काम भाव से किया गया कर्म ही मुक्ति का मार्ग है।
- अर्थात, जब मनुष्य अपने कर्मों को समर्पण भाव से करता है और फल की चिंता छोड़ देता है, तभी वह सच्ची स्वतंत्रता और शांति को प्राप्त करता है।
पदों का भावार्थ
कर्मजम् – कर्म से उत्पन्न
बुद्धि-युक्ताः – बुद्धियोग से युक्त
हि – निश्चय ही
फलम् त्यक्त्वा – फल को त्यागकर
मनीषिणः – ज्ञानी लोग
जन्म-बन्ध-विनिर्मुक्ताः – जन्म-मरण के बंधन से मुक्त
पदम् – अवस्था / स्थान
गच्छन्ति – प्राप्त करते हैं
अनामयम् – दुखरहित / रोगरहित
श्लोक का संदेश
जो व्यक्ति बुद्धियोग से युक्त होकर कर्मों के फल का त्याग करता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम शांति और आनंद को प्राप्त करता है।
इसलिए मनुष्य को निष्काम भाव से कर्म करते हुए अपने जीवन को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाना चाहिए।



