Press ESC to close

VedicPrayersVedicPrayers Ancient Vedic Mantras and Rituals

Shrimad Bhagavad Gita Chapter–2 Shalok–50 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय दो–श्लोक पचास | PDF

अध्याय 2 – सांख्य योग

श्लोक 50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते |
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् || 50||

सरल हिंदी में भावार्थ

हे अर्जुन!
समत्व बुद्धि से युक्त मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे और बुरे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
इसलिए तू योग में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मों में कुशलता है।

विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण कर्मयोग की सर्वोच्च अवस्था और उसके लाभ को समझाते हैं।

  1. समत्व बुद्धि से कर्म करना

कृष्ण कहते हैं कि जब मनुष्य समत्व बुद्धि (संतुलित मन) से कर्म करता है,
तो वह अच्छे और बुरे दोनों कर्मों के बंधन से ऊपर उठ जाता है।

अर्थात, वह कर्म तो करता है, लेकिन उनके प्रभाव से बंधता नहीं है।

  1. सुकृत और दुष्कृत से मुक्ति

सामान्यतः मनुष्य अच्छे कर्म (पुण्य) और बुरे कर्म (पाप) के फल में बंध जाता है।

लेकिन जो व्यक्ति बुद्धियोग में स्थित होता है,
वह इन दोनों से मुक्त हो जाता है और कर्म के चक्र से ऊपर उठता है।

  1. योग में स्थित होने का महत्व

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि योग में स्थित हो जाओ।
यह योग केवल ध्यान नहीं, बल्कि सही भाव से कर्म करने की कला है।

जब व्यक्ति योग में स्थित होता है,
तो वह हर परिस्थिति में संतुलित और शांत रहता है।

  1. योग ही कर्मों में कुशलता है

कृष्ण इस श्लोक में एक गहरा सत्य बताते हैं—
“योग: कर्मसु कौशलम्”

अर्थात, योग ही कर्म करने की सर्वोत्तम कला है।

जब व्यक्ति बिना आसक्ति के, सही समझ और संतुलन के साथ कार्य करता है,
तो उसका हर कर्म श्रेष्ठ और प्रभावी बन जाता है।

मुख्य बिंदु

  • समत्व बुद्धि से कर्म करने वाला व्यक्ति बंधन से मुक्त होता है।
  • पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठना संभव है।
  • योग में स्थित होकर कार्य करना आवश्यक है।
  • निष्काम कर्म ही सच्ची कुशलता है।
  • योग व्यक्ति को आंतरिक शांति और स्वतंत्रता देता है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म करना समस्या नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी आसक्ति ही बंधन का कारण है।
जब व्यक्ति समत्व भाव से कर्म करता है, तो वह कर्म के परिणामों से प्रभावित नहीं होता।

कृष्ण का संदेश है कि योग के माध्यम से व्यक्ति जीवन के हर कार्य को श्रेष्ठ बना सकता है।

अर्थात, योग केवल ध्यान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।

पदों का भावार्थ

बुद्धि-युक्तः – समत्व बुद्धि से युक्त
जहाति – त्याग देता है
इह – इस जीवन में
उभे – दोनों
सुकृत-दुष्कृते – अच्छे और बुरे कर्म
तस्मात् – इसलिए
योगाय – योग में
युज्यस्व – लग जाओ
योगः – योग
कर्मसु – कर्मों में
कौशलम् – कुशलता / निपुणता

श्लोक का संदेश

समत्व बुद्धि से कर्म करने वाला व्यक्ति पाप और पुण्य दोनों के बंधन से मुक्त हो जाता है। इसलिए मनुष्य को योग में स्थित होकर निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए, क्योंकि यही कर्म करने की सर्वोत्तम कला है और यही आत्मिक मुक्ति का मार्ग है।

Join Our Community: YouTube | Instagram | Twitter | WhatsApp

Stay Connected with Faith & Scriptures

"*" आवश्यक फ़ील्ड इंगित करता है

यह फ़ील्ड सत्यापन उद्देश्यों के लिए है और इसे अपरिवर्तित छोड़ दिया जाना चाहिए।
declaration*