
अध्याय 2 –सांख्य योग
श्लोक 8
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् |
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || 8||
सरल हिंदी में भावार्थ:
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा—
हे श्रीकृष्ण! मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देख पा रहा हूँ जो मेरे हृदय में बसे इस गहरे शोक को दूर कर सके, जो मेरी इंद्रियों को सुखा रहा है और मेरी चेतना को शिथिल कर रहा है।
यदि मुझे पृथ्वी का निष्कंटक, समृद्ध राज्य मिल जाए या देवताओं का भी स्वामी बना दिया जाए, तब भी मेरा यह दुःख समाप्त होता हुआ नहीं दिखाई देता।
विस्तृत व्याख्या:
इस श्लोक में अर्जुन अपनी मानसिक और भावनात्मक अवस्था को पूरी स्पष्टता से भगवान श्रीकृष्ण के सामने प्रकट करता है। युद्धभूमि में खड़े होकर अर्जुन केवल बाहरी युद्ध से ही नहीं, बल्कि भीतर चल रहे गहरे मानसिक द्वंद्व से भी जूझ रहा है।
अर्जुन कहता है कि वह ऐसा कोई मार्ग नहीं देख पा रहा जिससे उसके भीतर का शोक समाप्त हो सके। यह शोक इतना गहरा है कि उसकी इंद्रियाँ शिथिल हो चुकी हैं, उसका विवेक काम नहीं कर रहा और मन पूरी तरह व्याकुल हो गया है।
अर्जुन यह भी स्वीकार करता है कि यदि उसे पृथ्वी का संपूर्ण वैभव, निष्कंटक राज्य या यहाँ तक कि देवताओं का भी अधिपत्य मिल जाए, तब भी उसके मन का यह दुःख समाप्त नहीं होगा। इसका अर्थ है कि अर्जुन का दुःख भौतिक सुख-संपत्ति से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह उसके अंतर्मन में उत्पन्न हुआ गहन नैतिक और भावनात्मक संकट है।
यह श्लोक अर्जुन की पूर्ण असहायता और आत्मसमर्पण की स्थिति को दर्शाता है, जहाँ वह स्वीकार करता है कि उसके पास अब स्वयं कोई समाधान नहीं है।
पदों का भावार्थ:
न हि प्रपश्यामि –
मैं कोई स्पष्ट उपाय नहीं देख पा रहा हूँ।
मम अपनुद्यात् –
जो मेरे इस दुःख को दूर कर सके।
यत् शोकम् इन्द्रियाणाम् उच्छोषणम् –
यह शोक मेरी इंद्रियों और मानसिक शक्ति को सुखा रहा है।
अवाप्य भूमौ असपत्नम् ऋद्धम् राज्यम् –
यदि मुझे पृथ्वी का समृद्ध और निर्विरोध राज्य भी मिल जाए।
सुराणाम् अपि च आधिपत्यम् –
या देवताओं का भी स्वामित्व प्राप्त हो जाए।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ:
इस श्लोक में यह गहरा संदेश छिपा है कि जब मनुष्य का दुःख आत्मिक और नैतिक स्तर पर होता है, तब बाहरी उपलब्धियाँ, सत्ता, धन और वैभव उसे शांति नहीं दे सकते।
अर्जुन का शोक केवल युद्ध का भय नहीं है, बल्कि यह कर्तव्य, करुणा, मोह और आत्मसंघर्ष से उत्पन्न हुआ आंतरिक संकट है। यह अवस्था हर मनुष्य के जीवन में आती है, जब वह यह अनुभव करता है कि संसार की कोई भी उपलब्धि उसके भीतर की पीड़ा को समाप्त नहीं कर सकती।



