
अध्याय 3 – कर्म योग
श्लोक 5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥5॥
सरल हिंदी में भावार्थ
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण (सत्त्व, रज और तम) प्रत्येक व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध भी किसी न किसी कर्म में लगाते रहते हैं।
विस्तृत व्याख्या
कर्म करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार में कोई भी व्यक्ति पूरी तरह निष्क्रिय नहीं रह सकता। शरीर, मन और इन्द्रियाँ निरंतर कार्य करती रहती हैं। चाहे व्यक्ति बाहरी रूप से शांत बैठा हो, फिर भी उसके मन में विचार, भावनाएँ और इच्छाएँ चलती रहती हैं। इसलिए कर्म से पूर्णतः बचना संभव नहीं है।
प्रकृति के गुण कर्म करवाते हैं
भगवान कहते हैं कि सृष्टि में कार्य करने वाली प्रकृति के तीन गुण—सत्त्व, रज और तम—मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। ये गुण ही उसके विचारों, इच्छाओं और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसी कारण मनुष्य चाहे या न चाहे, वह किसी न किसी प्रकार के कर्म में लगा रहता है।
निष्क्रियता एक भ्रम है
कई लोग यह सोचते हैं कि कर्मों का त्याग कर देने से वे आध्यात्मिक बन जाएंगे, लेकिन भगवान स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी निष्क्रियता वास्तविक त्याग नहीं है। जब तक मन सक्रिय है, तब तक कर्म भी किसी न किसी रूप में होते रहते हैं। इसलिए कर्म से भागना समाधान नहीं है।
कर्मयोग का वास्तविक संदेश
कर्मयोग यह सिखाता है कि मनुष्य को कर्मों से दूर भागने के बजाय उन्हें सही भावना से करना चाहिए। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करता है और कर्मों के फल के प्रति आसक्त नहीं होता, तब वही कर्म आध्यात्मिक उन्नति का साधन बन जाते हैं।
मन और इन्द्रियों की गतिविधि भी कर्म है
भगवान यह संकेत देते हैं कि केवल शारीरिक कार्य ही कर्म नहीं हैं। सोचना, इच्छा करना, निर्णय लेना और भावनाओं का अनुभव करना भी कर्म के ही रूप हैं। इसलिए जीवन में कर्म की उपस्थिति निरंतर बनी रहती है।
मुख्य बिंदु
- कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिए भी पूर्णतः निष्क्रिय नहीं रह सकता।
- प्रकृति के तीन गुण मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।
- केवल बाहरी रूप से कर्म त्याग देना वास्तविक संन्यास नहीं है।
- मन, बुद्धि और इन्द्रियों की गतिविधियाँ भी कर्म हैं।
- कर्म से भागना नहीं, बल्कि सही भावना से कर्म करना आवश्यक है।
- निष्काम कर्म आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक बताता है कि कर्म जीवन का अविभाज्य अंग है। मनुष्य चाहे जितना भी प्रयास करे, वह प्रकृति के प्रभाव से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म छोड़ने की नहीं, बल्कि कर्मों को शुद्ध करने की शिक्षा देते हैं।
जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि कर्म करना उसकी स्वाभाविक अवस्था है और वह अपने सभी कार्यों को ईश्वर को समर्पित करके करता है, तब कर्म उसके लिए बंधन का कारण नहीं बनते। यही कर्मयोग का सार है।
पदों का भावार्थ
न हि – वास्तव में नहीं
कश्चित् – कोई भी व्यक्ति
क्षणम् अपि – एक क्षण भी
जातु – कभी भी
तिष्ठति – ठहरता है, रहता है
अकर्मकृत् – बिना कर्म किए
कार्यते – करवाया जाता है
हि – क्योंकि
अवशः – विवश होकर
कर्म – कर्म
सर्वः – प्रत्येक व्यक्ति
प्रकृतिजैः – प्रकृति से उत्पन्न
गुणैः – गुणों द्वारा
श्लोक का संदेश
मनुष्य स्वभावतः कर्मशील है और प्रकृति के गुण उसे निरंतर कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए कर्मों से भागना संभव नहीं है। सच्चा मार्ग यह है कि व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करे और अपने सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर दे। ऐसा करने से कर्म बंधन नहीं बनते और आत्मिक उन्नति का मार्ग खुलता है।



