Press ESC to close

VedicPrayersVedicPrayers Ancient Vedic Mantras and Rituals

Shrimad Bhagavad Gita Chapter–3 Shalok–6 | श्रीमद् भगवदगीता अध्याय तीन–श्लोक छह | PDF

अध्याय 3 – कर्म योग

श्लोक 6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥6॥

सरल हिंदी में भावार्थ

हे अर्जुन!
जो मनुष्य बाहर से अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर आदि) को तो रोक लेता है, लेकिन मन में लगातार विषय-भोगों का चिंतन करता रहता है, वह मोहग्रस्त और मिथ्याचारी (दिखावटी) कहलाता है।

विस्तृत व्याख्या

बाहरी संयम पर्याप्त नहीं

श्रीकृष्ण बताते हैं कि केवल शरीर से कर्मों का त्याग कर देना ही सच्चा त्याग नहीं है। यदि मन में अभी भी भोग-वासनाएँ और इन्द्रिय विषयों की इच्छा बनी हुई है, तो वह वास्तविक साधना नहीं कहलाती।

मन की शुद्धि का महत्व

मनुष्य का वास्तविक नियंत्रण उसके मन पर होना चाहिए। यदि मन इन्द्रिय विषयों में ही लगा रहे और केवल बाहरी रूप से संयम दिखाया जाए, तो वह आत्मिक उन्नति नहीं कर सकता।

मिथ्याचार का अर्थ

जो व्यक्ति बाहर से साधु या संयमी बनने का प्रदर्शन करता है, लेकिन भीतर से इच्छाओं और आसक्तियों में डूबा रहता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण मिथ्याचारी अर्थात् कपटी कहते हैं।

सच्चा योग क्या है

सच्चा योग केवल कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और इन्द्रियों का संतुलित नियंत्रण है। जब मनुष्य भीतर और बाहर दोनों रूपों से संयमित हो जाता है, तभी वह निष्काम कर्मयोग की ओर बढ़ता है।

आंतरिक और बाहरी एकरूपता

जीवन में वही व्यक्ति सफल साधक बन सकता है जिसकी सोच, वाणी और कर्म एक समान हों। दिखावा और वास्तविकता में अंतर होने पर आध्यात्मिक विकास संभव नहीं होता।

मुख्य बिंदु

  • केवल बाहरी संयम पर्याप्त नहीं है।
  • मन का नियंत्रण सबसे महत्वपूर्ण है।
  • दिखावटी त्याग को श्रीकृष्ण मिथ्याचार कहते हैं।
  • सच्चा योग मन और इन्द्रियों के संतुलन में है।
  • आंतरिक पवित्रता ही वास्तविक साधना है।

गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक सिखाता है कि आध्यात्मिक जीवन केवल बाहरी आचरण से नहीं बनता। यदि मन में वासनाएँ और विषयों की आसक्ति बनी रहती है, तो बाहरी त्याग व्यर्थ हो जाता है। भगवान कृष्ण का संदेश है कि सच्चा साधक वही है जो मन और इन्द्रियों दोनों को नियंत्रित कर आत्मा की ओर अग्रसर होता है।

अर्थात, बाहरी कर्मों से अधिक महत्वपूर्ण मन की शुद्धता और आंतरिक सत्यनिष्ठा है।

पदों का भावार्थ

कर्मेन्द्रियाणि – कर्म करने वाली इन्द्रियाँ (हाथ, पैर आदि)
संयम्य – वश में करके
यः – जो व्यक्ति
आस्ते – स्थित रहता है
मनसा – मन से
स्मरन् – स्मरण करता हुआ
इन्द्रियार्थान् – इन्द्रियों के विषयों का
विमूढात्मा – मोहग्रस्त बुद्धि वाला
मिथ्याचारः – कपटी, दिखावटी आचरण करने वाला
सः – वह
उच्यते – कहलाता है

श्लोक का संदेश

जो व्यक्ति केवल बाहर से इन्द्रियों को रोकता है लेकिन मन में विषय-वासना का चिंतन करता रहता है, वह सच्चा योगी नहीं बल्कि मिथ्याचारी कहलाता है। वास्तविक साधना तभी है जब मन और कर्म दोनों शुद्ध एवं संयमित हों।

Join Our Community: Instagram | Twitter | WhatsApp

Stay Connected with Faith & Scriptures

"*" आवश्यक फ़ील्ड इंगित करता है

यह फ़ील्ड सत्यापन उद्देश्यों के लिए है और इसे अपरिवर्तित छोड़ दिया जाना चाहिए।
declaration*