
भाद्रपद अमावस्या भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि होती है, जब आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता – इसे ‘नई चांद की रात’ भी कहते हैं। यह दिन विशेष रूप से पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए Shraddha और Tarpan जैसे अनुष्ठानों के लिए पवित्र माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान, और ब्राह्मणों को भोजन-दान से पुण्य की प्राप्ति होती है।
राजस्थान में इसे पिठोरी अमावस्या या भाड़ी अमावस्या के नाम से जाना जाता है, जहां रानी सती की पूजा और मेले का आयोजन भी होता है।
अगस्त 2025 में भाद्रपद अमावस्या की तिथि
इस वर्ष, अमावस्या तिथि 22 अगस्त 2025 को दोपहर लगभग 11:55 बजे शुरू होगी और 23 अगस्त 2025 को सुबह लगभग 11:35 बजे समाप्त होगी।
हिन्दू पंचांग (उदय तिथि के अनुसार) के अनुसार यह दिन 23 अगस्त, शनिवार को ही अमावस्या के रूप में मनाया जाएगा।
भाद्रपद अमावस्या का महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है। हर महीने कृष्ण पक्ष की अमावस्या आती है, लेकिन भाद्रपद मास की अमावस्या का स्थान विशेष माना गया है। इसे भाद्रपद अमावस्या या कई क्षेत्रों में पिठौरी अमावस्या कहा जाता है। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि पितरों की शांति और पुण्य प्राप्ति के लिए भी अत्यंत पवित्र माना जाता है।
भाद्रपद अमावस्या क्यों मनाई जाती है?
- पितृ तर्पण का महत्व
इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया तर्पण सीधे पितरों तक पहुँचता है और वे संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं। - पुण्य प्राप्ति
अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान करने, दान-पुण्य करने और ब्राह्मणों को भोजन कराने से पाप नष्ट होते हैं और व्यक्ति को सौभाग्य तथा समृद्धि प्राप्त होती है। - नकारात्मकता का नाश
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अमावस्या पर पूजा-पाठ और ध्यान से घर-परिवार में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है। - विशेष क्षेत्रीय परंपराएँ
राजस्थान में इसे पिठोरी अमावस्या या भाड़ी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन रानी सती जी की विशेष पूजा होती है और अनेक स्थानों पर भव्य मेले का आयोजन भी किया जाता है।
भाद्रपद अमावस्या के प्रमुख अनुष्ठान
- स्नान और दान → इस दिन सूर्योदय से पहले पवित्र नदियों या घर पर गंगाजल मिले जल से स्नान करना शुभ माना जाता है।
- दीपदान → रात्रि में दीप जलाकर शिवलिंग, पीपल या तुलसी के नीचे दीपदान करना विशेष फलदायी होता है।
- शिव पूजा → भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र, धूप और दीप अर्पित कर “ॐ नमः शिवाय” का जप करना शुभ माना गया है।
- पितृ तर्पण → जल, तिल और कुशा से तर्पण करके पितरों को संतुष्ट करने की परंपरा है।
- ब्राह्मण भोजन → अमावस्या के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना और वस्त्र दान करना परम पुण्यकारी कहा गया है।
भाद्रपद अमावस्या का संदेश
भाद्रपद अमावस्या आत्मचिंतन, पितरों की स्मृति और धर्म-कर्म का दिवस है। इस दिन उपवास, स्नान, दान और तर्पण करने से न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
भाद्रपद अमावस्या का पर्व हमें यह संदेश देता है कि हमारे जीवन की नींव पितरों के आशीर्वाद और उनकी कृपा पर टिकी है।
इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया तर्पण और दान-पुण्य न केवल आध्यात्मिक उन्नति देता है बल्कि पारिवारिक जीवन को भी सुख-समृद्धि से भर देता है।



